विधायी सुधारों पर ‘तोमर समिति’ का बड़ा धमाका: विधानसभा समितियों को सुपर-इफेक्टिव बनाने के लिए दीं 11 ऐतिहासिक अनुशंसाएं; लोकसभा अध्यक्ष को सौंपी अंतिम रिपोर्ट

कोलकाता/भोपाल: देश की लोकतांत्रिक व्यवस्था और विधायी कामकाज की रीढ़ मानी जाने वाली संसदीय व विधानसभा समितियों को जमीनी स्तर पर अधिक सुदृढ़, पारदर्शी और प्रभावी बनाने की दिशा में एक बहुत बड़ा विधिक व ऐतिहासिक कदम उठाया गया है। मध्य प्रदेश विधानसभा के अध्यक्ष नरेंद्र सिंह तोमर की अध्यक्षता में गठित देश के पीठासीन अधिकारियों (Presiding Officers) की उच्च स्तरीय समिति ने अपनी अंतिम समीक्षा बैठक के बाद 11 सूत्रीय क्रांतिकारी अनुशंसाओं का प्रतिवेदन तैयार कर लिया है। पश्चिम बंगाल विधानसभा, कोलकाता में संपन्न हुई इस अंतिम चरण की बैठक के बाद सात राज्यों के माननीय विधानसभा अध्यक्षों ने सामूहिक रूप से यह महत्वपूर्ण विधिक प्रतिवेदन लोकसभा अध्यक्ष ओम बिरला को सौंप दिया।

लोकसभा अध्यक्ष ओम बिरला की पहल पर हुआ था गठन; तीन चरणों के महामंथन से निकला अमृत

विधायी कार्यप्रणाली को समय के अनुकूल और अधिक जवाबदेह बनाने के लिए इस समिति के सफर की कड़ियाँ इस प्रकार हैं:

  • वित्तीय एवं तदर्थ समितियों का कायाकल्प: लोकसभा अध्यक्ष ओम बिरला ने विधायी और संसदीय कार्यवाही में वित्तीय (Financial) व तदर्थ (Ad-hoc) समितियों की भूमिका को धार देने के लिए इस विशेष विधिक समिति का गठन किया था। इसकी कमान मध्य प्रदेश के कद्दावर नेता और विधिक अध्यक्ष नरेंद्र सिंह तोमर को सौंपी गई थी।
  • तीन ऐतिहासिक बैठकें: समिति ने देश के अलग-अलग हिस्सों में व्यापक विधिक विचार-विमर्श किया। इसकी पहली बैठक 14 जुलाई 2025 को मध्य प्रदेश विधानसभा, भोपाल में, दूसरी बैठक 5 मई 2026 को राजस्थान विधानसभा, जयपुर में और तीसरी व निर्णायक बैठक कोलकाता में आयोजित की गई।

सतीश महाना और वासुदेव देवनानी समेत 7 राज्यों के अध्यक्षों ने संभाला मोर्चा; इन 11 मुख्य बिंदुओं पर केंद्रित हैं अनुशंसाएं

इस विधिक प्रतिवेदन को सौंपने के दौरान देश की सात प्रमुख विधानसभाओं के गौरवशाली अध्यक्ष मुख्य रूप से मौजूद रहे, जिनमें उत्तर प्रदेश के सतीश महाना और राजस्थान के वासुदेव देवनानी शामिल हैं। समिति ने जिन 11 विधिक बिंदुओं पर अपनी कड़ी अनुशंसाएं दी हैं, वे निम्नलिखित हैं:

  1. कार्यकाल, कोरम और बैठकों की संख्या: समितियों के सदस्यों के निश्चित कार्यकाल, विधिक कोरम (गणपूर्ति) की अनिवार्यता और सालभर में होने वाली बैठकों की न्यूनतम संख्या तय करना।
  2. सख्त क्रियान्वयन और बजट परीक्षण: समितियों द्वारा दी गई जनहित की अनुशंसाओं को कार्यपालिका (정부) द्वारा समय पर लागू कराना और बजट के सूक्ष्म परीक्षण के लिए ‘स्थायी समितियों’ (Standing Committees) का अनिवार्य गठन।
  3. विशेषज्ञों की एंट्री और साक्ष्य: विधायी विधेयकों पर गहन मंथन के लिए बाहरी तकनीकी विशेषज्ञों को आमंत्रित करना, अधिकारियों के लिए प्रशिक्षण कार्यक्रम और मौखिक साक्ष्य के समय विभागीय प्रमुखों की अनिवार्य विधिक उपस्थिति।
  4. अध्ययन दौरे और सलाहकार समितियां: अध्ययन दौरों (Study Tours) के बाद उनकी रिपोर्ट पर की जाने वाली वास्तविक विधिक कार्रवाई और नई सलाहकार समितियों का गठन।

संसदीय लोकतंत्र को नई मजबूती देगा यह प्रतिवेदन — विधिक रणनीतिकार

प्रशासनिक मुस्तैदी और विधायी सुदृढ़ीकरण का संदेश —

“राजनीतिक विश्लेषकों और विधिक विशेषज्ञों के अनुसार, नरेंद्र सिंह तोमर की अध्यक्षता वाली इस समिति की रिपोर्ट देश के संसदीय इतिहास में मील का पत्थर साबित होगी. अक्सर देखा जाता है कि विधानसभा समितियां केवल औपचारिक बनकर रह जाती हैं, लेकिन इन 11 अनुशंसाओं के लागू होने के बाद नौकरशाही (Bureaucracy) को समितियों के प्रति अधिक विधिक जवाबदेह बनना पड़ेगा.

प्रतिवेदन सौंपने के दौरान हिमाचल प्रदेश के कुलदीप सिंह पठानिया, पश्चिम बंगाल के रथीन्द्र नाथ बोस, सिक्किम के मिंग्मा नोर्बु शेरपा और ओडिशा की सुरामा पाढ़ी भी उपस्थित रहीं। अब सभी की निगाहें लोकसभा सचिवालय की अगली विधिक कड़ियों पर टिकी हैं, जिससे इन नियमों को देश की समस्त विधानसभाओं में समान रूप से लागू किया जा सके।”

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