चित्रकूट (सतना): आज ‘विश्व नेत्रदान दिवस’ (World Eye Donation Day) है। इस खास मौके पर विंध्य अंचल के गौरव और एशिया के अग्रणी नेत्र केंद्रों में शुमार चित्रकूट के जानकीकुंड नेत्र चिकित्सालय (सद्गुरु सेवा ट्रस्ट) की सफलता की कहानी देश के लिए एक मिसाल बनकर सामने आई है। एक दौर था जब लोग इस भ्रांति और अंधविश्वास के शिकार थे कि “यदि इस जन्म में नेत्रदान करेंगे, तो अगले जन्म में अंधे पैदा होंगे।” लेकिन संतों के आशीर्वाद और पद्मश्री डॉ. बीके जैन के अटूट संकल्प ने इस मिथक को ऐसा तोड़ा कि आज यह संस्थान अंधत्व निवारण के क्षेत्र में पूरे देश की रीढ़ बन चुका है।

जब नुक्कड़ नाटकों और संतों की समझाइश से बदला समाज
शुरुआती दौर में जब संस्थान ने ग्रामीण अंचलों में नेत्र शिविर लगाने शुरू किए, तो भ्रांतियों के चलते ग्रामीणों ने डर के मारे शिविरों में आना ही बंद कर दिया था:
- संतों ने जगाई अलख: इस गंभीर चुनौती से निपटने के लिए संस्थान को परम पूज्य स्वामी रणछोड़ दास जी महाराज का सानिध्य मिला। संतों ने खुद आगे आकर ग्रामीणों को समझाया कि नेत्रदान महादान है और इससे किसी की अंधेरी जिंदगी रोशन हो सकती है।
- मफतलाल समूह का मिला साथ: महाराज श्री के आह्वान पर शुरू हुए इस महाअभियान को प्रसिद्ध उद्योगपति अरविंद भाई मफतलाल का बड़ा आर्थिक सहयोग मिला। शुरुआती वर्षों में बेहद सीमित संसाधनों के बीच टेंट और टीन शेड के नीचे मरीजों का इलाज किया जाता था।
सतना के लाल डॉ. बीके जैन ने चुकाया माटी का कर्ज
मुंबई जैसे चकाचौंध भरे महानगर में एक बेहद उज्ज्वल और अमीर भविष्य को छोड़कर डॉ. बीके जैन 1980 में चित्रकूट के इस पिछड़े और आदिवासी बहुल इलाके में आ गए थे:
- रीवा और मुंबई से की पढ़ाई: डॉ. जैन ने 1973 में श्याम शाह चिकित्सा महाविद्यालय, रीवा से एमबीबीएस (MBBS) और 1979 में सायन अस्पताल मुंबई से नेत्र रोग में एमएस (MS) किया था।
- राष्ट्रपति ने दिया पद्मश्री: चिकित्सा और अंधत्व निवारण के क्षेत्र में उनके इसी असाधारण और निश्शुल्क योगदान के लिए 27 मई 2025 को राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मु ने उन्हें नई दिल्ली में पद्वश्री से अलंकृत किया था। वर्तमान में उनकी विरासत को उनकी पत्नी ऊषा जैन और प्रशासनिक प्रमुख पुत्र डॉ. इलेश जैन सेवा भाव से आगे बढ़ा रहे हैं।
अब दो आंखों से 4 लोगों को मिल रही रोशनी: डॉ. इलेश जैन
जानकीकुंड नेत्र चिकित्सालय के डायरेक्टर डॉ. इलेश जैन ने तकनीक और आंकड़ों को लेकर बेहद महत्वपूर्ण जानकारियां साझा की हैं:
बदली तकनीक, बढ़े प्रयास —
“इंसान की मृत्यु के बाद 6 से 8 घंटे के भीतर नेत्रदान (Eye Donation) किया जा सकता है। पहले पारंपरिक तकनीक से एक व्यक्ति की दो आंखों (कॉर्निया) से केवल दो ही लोगों को रोशनी मिल पाती थी। लेकिन अब अत्याधुनिक मेडिकल साइंस के जरिए दो आंखों से 4 नेत्रहीनों के जीवन में उजाला लाया जा रहा है।”
जानकीकुंड नेत्र चिकित्सालय: आंकड़ों में सेवा का महासागर
- 30 साल का रिकॉर्ड: अब तक इस संस्थान के माध्यम से करीब 9,000 सफल नेत्रदान कराए जा चुके हैं।
- मोतियाबिंद मुक्त क्षेत्र: मध्य प्रदेश के पन्ना, सतना और उत्तर प्रदेश के बांदा, हमीरपुर और फतेहपुर जिलों में 130 से अधिक विजन सेंटर खोलकर इन पांचों जिलों को पूरी तरह मोतियाबिंद मुक्त किया जा चुका है।
- 2025 का सेवा ग्राफ: अकेले वर्ष 2025 में 15 lakh मरीजों ने ओपीडी (OPD) सेवाओं का लाभ लिया, जबकि 1.65 लाख से अधिक आंखों के ऑपरेशन किए गए, जिनमें से 70 प्रतिशत ऑपरेशन पूरी तरह निश्शुल्क (फ्री) रहे।
- विशाल टीम और वर्ल्ड क्लास इंफ्रास्ट्रक्चर: वर्तमान में यहाँ 150 से अधिक विशेषज्ञ डॉक्टर और 1,000 से ज्यादा पैरामेडिकल स्टाफ की टीम कार्यरत है। संस्थान में विश्व का सबसे अत्याधुनिक और सर्वसुविधायुक्त नेत्र शल्य (सर्जरी) कक्ष स्थापित है।







