महिलाओं की पुकार सुन लीजिए साहब… बराखुर्द की शिकायतों पर आखिर कब टूटेगी संरक्षण की दीवार?

मैहर, मध्य प्रदेश: मैहर तहसील के ग्राम पंचायत बराखुर्द से एक ऐसा मामला सामने आया है जो जिला प्रशासन के बड़े-बड़े दावों और ‘जनसुनवाई’ की हकीकत पर गंभीर सवालिया निशान खड़े करता है। यहाँ गांव की महिलाएं भ्रष्टाचार के खिलाफ न्याय की उम्मीद में कलेक्टर की चौखट तक पहुंची थीं। हाथों में शिकायत, आंखों में उम्मीद और मन में भरोसा था कि शायद अब उनकी सुनवाई होगी। लेकिन करीब 15 दिन बीत जाने के बाद भी जब कोई निष्पक्ष जांच या ठोस कार्रवाई सामने नहीं आई, तो महिलाओं की यह उम्मीद अब गहरे आक्रोश और निराशा में बदलती दिखाई दे रही है।

क्या पंचायत सचिव के लिए ‘ढाल’ बन गए हैं जनपद सीईओ?

इस पूरे मामले में सबसे चौंकाने वाला मोड़ तब आया जब प्रशासनिक गलियारों और क्षेत्र में एक बेहद गंभीर चर्चा ने जोर पकड़ लिया।

  • संरक्षण का आरोप: सूत्र बताते हैं कि बराखुर्द पंचायत सचिव के बचाव में खुद जनपद सीईओ (CEO) ने मोर्चा संभाल लिया है।
  • चर्चाओं का बाजार गर्म: क्षेत्र में दबी जुबान में यहाँ तक चर्चा है कि सचिव को कथित तौर पर यह अभयदान (भरोसा) दिया गया है कि—‘कितना भी भ्रष्टाचार करो, जब तक मैं हूं कुछ नहीं होने दूंगा’।
  • संदेह के घेरे में अफसरशाही: हालांकि इन दावों की कोई आधिकारिक पुष्टि नहीं हुई है, लेकिन जनसुनवाई जैसी उच्च स्तरीय शिकायत के बाद भी रत्ती भर कार्रवाई न होना, इस कथित संरक्षण की दीवार को और मजबूत करता दिखाई दे रहा है।

कलेक्टर की जनसुनवाई पर भी उठने लगे सवाल

ग्रामीण महिलाओं का कहना है कि उन्होंने स्थानीय स्तर पर सुनवाई न होने के बाद जिला मुख्यालय का रुख किया था। उन्हें लगा था कि कलेक्टर की जनसुनवाई में जिला स्तर के आला अधिकारी उनकी पीड़ा समझेंगे और दूध का दूध, पानी का पानी करेंगे। लेकिन अब 15 दिन बाद खाली हाथ बैठी महिलाएं खुद प्रशासनिक सिस्टम पर सवाल उठा रही हैं:

“अगर जिले की सबसे बड़ी जनसुनवाई में जाने के बाद भी हमारी शिकायतों पर एक निष्पक्ष जांच तक शुरू नहीं होती, तो आखिर हम जैसी आम जनता न्याय की उम्मीद किससे करे?” — पीड़ित ग्रामीण महिलाएं, बराखुर्द

बराखुर्द पंचायत: कथित भ्रष्टाचार और अनियमितताओं का पुराना गढ़!

यह कोई पहली बार नहीं है जब बराखुर्द पंचायत की कार्यप्रणाली पर उंगलियां उठी हों। यह पंचायत पहले भी कई गंभीर मामलों को लेकर सुर्खियों में रही है:

  • घटिया और अधूरे निर्माण कार्य: गांव में हुए विकास कार्यों की जमीनी हकीकत दावों से कोसों दूर है।
  • शासकीय राशि का दुरुपयोग: सरकारी बजट को ठिकाने लगाने और कागजों पर काम समेटने के आरोप लगातार लगते रहे हैं।
  • शिकायतों को दबाने का खेल: महिलाओं का सीधा आरोप है कि भ्रष्टाचार पर एक्शन लेने के बजाय हर बार शिकायतों को फाइलों में दबाकर रफा-दफा करने की कोशिश की जाती है।

सबसे बड़ा सवाल: आखिर आम आदमी जाए तो जाए कहाँ?

बराखुर्द की इस जमीनी लड़ाई ने मैहर प्रशासनिक अमले को कटघरे में खड़ा कर दिया है। अब सबसे बड़े सवाल यही हैं:

  1. क्या जनपद स्तर पर बैठे जिम्मेदार अधिकारी सचमुच दागी पंचायत सचिव की ढाल बने रहेंगे?
  2. क्या इन गरीब और जागरूक महिलाओं की शिकायतें सिर्फ रद्दी की टोकरी में डाल दी जाएंगी?
  3. क्या मैहर जिला प्रशासन बराखुर्द पंचायत के खातों और निर्माण कार्यों की निष्पक्ष उच्च स्तरीय जांच कराकर सच्चाई जनता के सामने लाएगा?

गांव की महिलाओं का यह दर्द और तीखा सवाल अब पूरे मैहर में गूंज रहा है—”अगर साहब की जनसुनवाई भी बेअसर हो जाए, तो फिर आम आदमी अपनी गुहार लेकर जाए तो जाए कहाँ?”

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