कोविड में जो बने थे संजीवनी, जिला अस्पताल बनने पर वही ‘शोपीस’: मैहर में जनभागीदारी से स्थापित दोनों ऑक्सीजन प्लांट बंद; सतना रेफर हो रहे गंभीर मरीज, स्वास्थ्य व्यवस्थाओं पर बड़े सवाल

मैहर: कोविड-19 वैश्विक महामारी के उस भयावह दौर को कोई नहीं भूल सकता, जब ऑक्सीजन के एक-एक सिलेंडर के लिए पूरे देश में त्राहि-त्राहि मची थी। उस कठिन समय में मैहर सिविल अस्पताल में मरीजों की जान बचाने और भविष्य की आपात स्थितियों से निपटने के लिए दो-दो हाई-टेक ऑक्सीजन प्लांट स्थापित किए गए थे। मकसद साफ था कि मैहर को कभी बाहरी सिलेंडरों पर निर्भर न रहना पड़े। लेकिन विडंबना देखिए कि आज मैहर को पूर्ण ‘जिला अस्पताल’ का दर्जा मिलने के बाद भी ये दोनों जीवनरक्षक प्लांट महीनों से बंद पड़े हैं। तत्कालीन विधायक की विशेष पहल और आम जनता के सहयोग (जनभागीदारी) से खड़े किए गए ये प्लांट आज प्रशासनिक उदासीनता के कारण कबाड़ और शोपीस में तब्दील हो रहे हैं।

आपदा के दौर में कैसे खड़ी हुई थी मैहर की यह ताकत

अस्पताल प्रबंधन और स्वास्थ्य विभाग के पुराने रिकॉर्ड के अनुसार, इन प्लांटों की स्थापना की क्रोनोलॉजी बेहद महत्वपूर्ण थी:

  • 2021 में जनसहयोग से लगा पहला प्लांट: कोविड की दूसरी जानलेवा लहर के दौरान वर्ष 2021 में तत्कालीन विधायक की अपील पर मैहर के दानदाताओं और जनसहयोग से पहला ऑक्सीजन प्लांट लगाया गया था। इसकी क्षमता 250 लीटर प्रति मिनट (LPM) थी, जिससे एक साथ दर्जनों बेड पर निर्बाध सप्लाई दी जा सकती थी।
  • अस्पताल में लगा दूसरा पीएसए (PSA) प्लांट: इसी आपदा को देखते हुए बाद में सरकार और स्वास्थ्य विभाग की ओर से अस्पताल परिसर में एक और उच्च क्षमता वाला ‘PSA ऑक्सीजन प्लांट’ स्थापित किया गया। दोनों प्लांटों के शुरू होने के बाद पूरे अस्पताल में बकायदा सेंट्रलाइज्ड ऑक्सीजन पाइपलाइन और स्पेशल ऑक्सीजन बेड की व्यवस्था चाक-चौबंद की गई थी।

तकनीकी खराबी और मेंटेनेंस का रोना; मरीजों को खुद करने पड़ रहे सिलेंडरों के इंतजाम

करोड़ों रुपये की लागत से तैयार यह जीवनरक्षक बुनियादी ढांचा आज पूरी तरह ठप पड़ा है, जिससे मैहर और आसपास के ग्रामीण अंचलों से आने वाले गरीब मरीजों की जान आफत में है:

  1. तकनीकी कर्मचारियों का टोटा: स्वास्थ्य विभाग के सूत्रों के मुताबिक, दोनों प्लांट वर्तमान में मामूली तकनीकी खराबी, समय पर सर्विसिंग न होने और इन्हें चलाने वाले कुशल ऑपरेटरों (तकनीकी कर्मचारियों) की नियुक्ति न होने के कारण बंद पड़े हैं।
  2. सतना जिला अस्पताल के भरोसे मैहर: वर्तमान में यदि कोई गंभीर मरीज, सांस का रोगी या एक्सीडेंट केस अस्पताल आता है, जिसे तत्काल हाई-फ्लो ऑक्सीजन की जरूरत होती है, तो उसे प्राथमिक उपचार देकर सीधे सतना जिला अस्पताल या रीवा मेडिकल कॉलेज रेफर कर दिया जाता है। कई बार आर्थिक रूप से सक्षम परिजन निजी स्तर पर सिलेंडरों की व्यवस्था करने को मजबूर हैं।

जिला अस्पताल का नाम बड़ा, पर दर्शन छोटे; जनता में पनप रहा भारी आक्रोश

स्थानीय नागरिकों और सामाजिक कार्यकर्ताओं की मांग —

“मैहर के प्रबुद्ध नागरिकों का कहना है कि मैहर को नया जिला बने और सिविल अस्पताल को जिला अस्पताल का अपग्रेडेशन मिले लंबा समय बीत चुका है। कायदे से यहाँ सुविधाएं, बजट और डॉक्टर्स बढ़ने चाहिए थे, लेकिन यहाँ तो पहले से मौजूद जीवनरक्षक ऑक्सीजन व्यवस्था ही ठप कर दी गई। जनता के पैसे और तत्कालीन विधायक की मेहनत से बने इस प्लांट को इस तरह बर्बाद होते देखना बेहद दुखद है।”

अब क्षेत्र की जनता और मरीजों के परिजनों ने स्वास्थ्य विभाग के उच्चाधिकारियों और जिला प्रशासन से पुरजोर मांग की है कि मैहर जिला अस्पताल के दोनों ऑक्सीजन प्लांटों को तत्काल प्रभाव से सुधारा जाए, तकनीकी स्टाफ की स्थाई तैनाती हो और इसकी नियमित मॉनिटरिंग (समीक्षा) की जाए, ताकि इलाज के अभाव में किसी मासूम को अपनी जान न गंवानी पड़े।

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