रीवा: भारतीय जनता पार्टी (BJP) के वरिष्ठ नेता और मध्य प्रदेश के पूर्व गृह मंत्री डॉ. नरोत्तम मिश्रा अपने एकदिवसीय संगठनात्मक प्रवास पर बुधवार को रीवा पहुंचे। यहाँ मीडियाकर्मियों और पत्रकारों को संबोधित करते हुए उन्होंने 25 जून 1975 को देश में लागू हुए आपातकाल (Emergency) के काले अध्याय को लेकर कांग्रेस पार्टी और शीर्ष नेतृत्व पर तीखा विधिक व राजनीतिक हमला बोला। नरोत्तम मिश्रा ने दोटूक लहजे में कहा कि आज आपातकाल के 51 साल पूरे हो चुके हैं, लेकिन इसके गहरे जख्म आज भी देश के लोकतंत्र के मानस पटल पर पूरी तरह हरे हैं।

“एक लाख से ज्यादा लोग हुए प्रभावित; तानाशाही का प्रतीक है कांग्रेस”
पूर्व गृह मंत्री ने आपातकाल के दौरान जेलों में बंद रहे सेनानियों की पीड़ा और कांग्रेस की क्रूरता को लेकर कई गंभीर बातें कहीं:
- विचारधारा पर उठाया सवाल: नरोत्तम मिश्रा ने कहा कि लोगों के मन में यह सवाल स्वाभाविक रूप से उठता होगा कि आधी सदी बीत जाने के बाद भी आपातकाल का दर्द कम क्यों नहीं हुआ। उन्होंने स्पष्ट किया कि इमरजेंसी महज एक प्रशासनिक घटना नहीं थी, बल्कि यह एक तानाशाही विचार था, जो आज भी कांग्रेस और गांधी-नेहरू परिवार के भीतर गहराई से रचा-बसा है। यह खुद को देश के लोकतंत्र से ऊपर समझने की मानसिकता का प्रतीक है।
- देश ने लड़ीं दो आज़ादियां: भाजपा नेता ने ऐतिहासिक तुलना करते हुए कहा कि भारत ने दो बार स्वतंत्रता का संघर्ष किया है— पहली लड़ाई फिरंगियों (अंग्रेजों) के खिलाफ हमारे महान स्वतंत्रता सेनानियों ने लड़ी, और दूसरी लड़ाई देश के भीतर ही लोकतंत्र को बचाने के लिए ‘लोकतंत्र सेनानियों’ ने मजबूती से लड़ी।
क्रूरता का आलम: “जेल में बंद स्वयंसेवकों को अपनों की मौत पर भी नहीं मिलने दिया गया”
कांग्रेस की तत्कालीन दंडात्मक कार्यप्रणाली को आड़े हाथों लेते हुए नरोत्तम मिश्रा ने भावुक और कड़े शब्दों का इस्तेमाल किया:
- शीर्ष नेताओं सहित छोटे कार्यकर्ता हुए बंद: उन्होंने याद दिलाया कि इस क्रूर आपातकाल के दौरान देश के 1 लाख से अधिक लोग सीधे तौर पर प्रताड़ित और प्रभावित हुए थे। जेल जाने वालों में श्रद्धेय अटल बिहारी वाजपेयी, लालकृष्ण आडवाणी, राजनाथ सिंह जैसे कद्दावर नेताओं से लेकर राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (RSS) और भारतीय जनसंघ के सबसे छोटे मैदानी स्वयंसेवक तक शामिल थे।
- मानवीय संवेदनाएं हुईं खत्म: मिश्रा ने आरोप लगाया कि क्रूरता की सीमा यह थी कि जेलों में बंद भारतीय जनता पार्टी और जनसंघ के कार्यकर्ताओं को उनके सगे परिवार से मिलने तक की विधिक अनुमति नहीं थी। यहाँ तक कि यदि जेल के बाहर उनके किसी प्रियजन का देहांत (दिवंगत) भी हो जाता था, तो भी उन्हें अंतिम दर्शन या परिवार को ढांढस बंधाने के लिए पैरोल तक नहीं दी जाती थी। यह कांग्रेस की अमानवीय और क्रूर मानसिकता का सबसे बड़ा ऐतिहासिक प्रमाण है।
संविधान की किताब पर तंज: “इंदिरा गांधी ने 31 बार तोड़ा संविधान, आज उनका बेटा किताब लेकर घूम रहा है”
संविधान संशोधन और वर्तमान राजनीति पर तीखा कटाक्ष —
“रीवा में प्रेस वार्ता के दौरान पूर्व गृह मंत्री ने लोकसभा में नेता प्रतिपक्ष राहुल गांधी पर सीधा निशाना साधते हुए अचंभित करने वाला विरोधाभास उजागर किया। नरोत्तम मिश्रा ने कहा— ‘यह भारतीय राजनीति का सबसे बड़ा अचंभा है कि जिन लोगों ने देश के पवित्र संविधान को अपने निजी स्वार्थ के लिए कई बार तोड़ा और मरोड़ा, वे आज इसके रक्षक बन रहे हैं। अकेले पूर्व प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी ने अपने कार्यकाल में इस संविधान में रिकॉर्ड 31 बार मनमाने संशोधन कर दिए। बेहद अचंभे की बात है कि आज उन्हीं का बेटा (राहुल गांधी) हाथों में संविधान की लाल किताब लेकर घूम रहा है और देश की स्वायत्तता व लोकतंत्र को बचाने की दुहाई दे रहा है। जिसने खुद लोकतंत्र को अपने पैरों तले रौंद दिया, वो आज उसकी रक्षा की बात कर रहा है।’“
नरोत्तम मिश्रा के इस कड़े वैचारिक और राजनीतिक बयान के बाद विंध्य क्षेत्र सहित मध्य प्रदेश के सियासी गलियारों में आपातकाल के इतिहास और संविधान की वर्तमान स्थिति को लेकर बहस एक बार फिर गरमा गई है।







