मैहर : महात्मा गांधी के स्वावलंबन और ग्रामोद्योग के विचारों को पीढ़ियों से सहेजे मैहर जिले का सुदूर गांव सुलखमा आज अपनी पहचान बचाने के लिए अस्तित्व की लड़ाई लड़ रहा है। जिला मुख्यालय से लगभग 80 किलोमीटर दूर स्थित इस गांव में पाल समाज के लोग सदियों से भेड़ पालन और उनकी ऊन से पारंपरिक कंबल-पट्टी तैयार कर आजीविका चलाते आ रहे हैं। गांधी जयंती (2 अक्टूबर) के अवसर पर जहां देशभर में खादी और आत्मनिर्भरता के दावे किए जा रहे हैं, वहीं इस ‘गांधी गांव’ में बाजार और उचित मूल्य के अभाव में चरखे की सुरीली आवाज अब धीरे-धीरे खामोश होने की कगार पर पहुंच गई है।

एक कंबल में हफ्तेभर की कड़ी मेहनत, बदले में महज 1000 रुपये; गांव-गांव घूमने को मजबूर बुनकर
सुलखमा में कंबल तैयार करने की प्रक्रिया बेहद जटिल और श्रमसाध्य है। ग्रामीण पहले भेड़ों से ऊन काटकर उसकी सफाई और धुनाई करते हैं, फिर चरखे पर सूत कातकर धागा तैयार किया जाता है। एक कंबल बुनने में पूरे परिवार की हफ्तेभर की मेहनत लगती है, लेकिन स्थानीय बाजार और सरकारी विपणन (मार्कैटिंग) व्यवस्था न होने से इसकी कीमत महज एक हजार रुपये मिल पाती है। स्थायी बाजार न होने के कारण ग्रामीणों को तैयार कंबलों को कंधे पर लादकर गांव-गांव घूम-घूमकर बेचना पड़ता है, जिससे उनकी रोजाना की मजदूरी भी नहीं निकल पाती।

सालाना आश्वासनों के बीच सिमटती विरासत, शहरों की ओर पलायन कर रही नई पीढ़ी
ग्रामीणों का दर्द है कि हर साल 2 अक्टूबर को जनप्रतिनिधि और प्रशासनिक अधिकारी गांव आकर स्वावलंबन की परंपरा की सराहना तो करते हैं, पर स्थायी बाजार, ट्रेनिंग या आर्थिक सहयोग के वादे कागजों से बाहर नहीं निकलते। कम आमदनी के चलते गांव की नई पीढ़ी इस पुश्तैनी हुनर से मुंह मोड़ रही है। रोजगार की तलाश में युवा दिल्ली, मुंबई और गुजरात जैसे बड़े शहरों की ओर पलायन करने को मजबूर हैं। यदि समय रहते प्रशासन और खादी ग्रामोद्योग बोर्ड ने सुलखमा के बुनकरों को स्थायी बाजार उपलब्ध नहीं कराया, तो गांधीवादी स्वावलंबन का यह जीवित प्रतीक जल्द ही इतिहास के पन्नों में दफन हो जाएगा।












