The Khabrilal News India : मकर संक्रांति का नाम आते ही कभी मैहर जिले के रामनगर अंचल में उत्सव की तस्वीर उभर आती थी। सोन नदी के तट पर लगने वाले मेले सिर्फ धार्मिक आयोजन नहीं होते थे,बल्कि सामाजिक जीवन की धड़कन हुआ करते थे। बाणसागर और मार्कंडेय घाट पर 15-15 दिनों तक चलने वाले इन मेलों में आसपास के सैकड़ों गांवों के लोग जुटते थे। बिछड़े रिश्ते मिलते, पुराने दोस्त गले लगते, और पीढ़ियों से चले आ रहे संबंधों में फिर से जान आ जाती थी। लेकिन “बिसरा दी गई सोन”
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Forgotten Son River : मकर संक्रांति का नाम आते ही कभी मैहर जिले के रामनगर अंचल में उत्सव की तस्वीर उभर आती थी। सोन नदी के तट पर लगने वाले मेले सिर्फ धार्मिक आयोजन नहीं होते थे,बल्कि सामाजिक जीवन की धड़कन हुआ करते थे। बाणसागर और मार्कंडेय घाट पर 15-15 दिनों तक चलने वाले इन मेलों में आसपास के सैकड़ों गांवों के लोग जुटते थे। बिछड़े रिश्ते मिलते, पुराने दोस्त गले लगते, और पीढ़ियों से चले आ रहे संबंधों में फिर से जान आ जाती थी। इन मेलों से लाखों रुपए का व्यापार होता था, लेकिन उससे कहीं ज़्यादा कीमती था लोगों का आपसी जुड़ाव। सोन नदी उस पूरे इलाके की जीवनरेखा थी संस्कृति,परंपरा और रोज़मर्रा की ज़िंदगी का आधार। बाणसागर बांध के निर्माण ने इस पूरे परिदृश्य को बदल दिया। सोन नदी का बहाव थम गया और उसके साथ ही थम गई उस अंचल की सांसें। नदी के किनारे बसे लगभग साढ़े तीन सौ गांव उजड़ गए। सदियों से बसे परिवार विस्थापित हो गए। घर, मंदिर, घाट, खेत और श्मशान सब पानी के नीचे चले गए। यह सिर्फ ज़मीन का विस्थापन नहीं था,यह रिश्तों का बिखराव था। कोई भाई से दूर हो गया,तो कोई पंडित अपने नाई से। जो लोग हर सुख-दुख में साथ हंसते और रोते थे,वे आज एक-दूसरे का हाल पूछने को तरस गए। विस्थापन ने लोगों को सिर्फ जगह से नहीं,उनकी पहचान से भी अलग कर दिया। आज प्रदेश में नर्मदा समेत अन्य नदियों के नाम पर नदी महोत्सव मनाए जाते हैं। मंच सजते हैं, दीप जलते हैं, भाषण होते हैं और संस्कृति के संरक्षण की बातें कही जाती हैं। लेकिन बाणसागर परियोजना के लिए अपना सब कुछ समर्पित करने वाली सोन नदी और उसके तटवासी आज भी उपेक्षित हैं। न सोन के लिए कोई महोत्सव है, न उसके विस्थापितों की पीड़ा को मंच मिलता है। जिन लोगों ने विकास की नींव में अपनी ज़िंदगी, अपनी ज़मीन और अपने रिश्ते कुर्बान कर दिए, वे आज भी पहचान और सम्मान की तलाश में हैं। नदी भी थी रिश्तों की धारा भी सोन सिर्फ एक नदी नहीं थी। वह रिश्तों की धारा थी,मेलों की रौनक थी,गांवों की आत्मा थी। उसके सूखने के साथ ही एक पूरी सभ्यता, एक पूरी सामाजिक संरचना बिखर गई। आज सोन के तट सूने हैं। न मेले हैं न चहल-पहल। सिर्फ यादें हैं जो हर मकर संक्रांति पर उन लोगों के दिलों में टीस बनकर उभर आती हैं जिन्हें विकास ने पीछे छोड़ दिया। और सोन को बिसरा दिया गया…और उसके साथ बिसरा दिए गए वे लोग, जिन्होंने देश के विकास के लिए अपना सब कुछ खो दिया।
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