मऊगंज में ₹50 करोड़ का ‘गौशाला महाघोटाला’: कागजों पर चर गईं 24 हजार गायें, खाली पड़े शेडों में भी लाखों का भुगतान; डिप्टी डायरेक्टर पर रिश्वत के चेक से रीवा में बंगला खरीदने का आरोप, अफसर बोले— ‘कर्ज लेकर बनाया घर’

मऊगंज/ मध्य प्रदेश के नवगठित जिले मऊगंज से पशुपालन विभाग की कार्यप्रणाली और सरकारी धन के कथित बंदरबांट का एक बेहद सनसनीखेज और बड़ा विधिक मामला सामने आया है। सूचना के अधिकार (RTI) और सरकारी ‘गौ संवर्धन पोर्टल’ के विलेखों से अंचल में संचालित गौशालाओं के नाम पर करीब 50 करोड़ रुपये के अनुदान में भारी वित्तीय अनियमितता के आरोप लगे हैं। शिकायतकर्ताओं का दावा है कि जिन गौशालाओं के शेड खाली पड़े हैं और ताले लटके हैं, वहां भी कागजों पर हजारों गोवंश दिखाकर हर महीने शासन को लाखों रुपये का विधिक चूना लगाया गया। इतना ही नहीं, इस कथित घोटाले की कड़ियाँ विभाग के शीर्ष अधिकारी द्वारा रिश्वत के पैसों से रीवा में आलीशान मकान खरीदने के विधिक आरोपों तक जा पहुंची हैं।

आंकड़े और जमीनी हकीकत में जमीन-आसमान का अंतर; विधायक प्रदीप पटेल ने विधानसभा में उठाया था प्रश्न

गौ संवर्धन पोर्टल और भौतिक सत्यापन विलेखों के बीच के इस बड़े अंतर की मुख्य कड़ियाँ इस प्रकार हैं:

  • कागजी गोवंश का खेल: सरकारी रिकॉर्ड के अनुसार मऊगंज जिले की 77 गौशालाओं (नईगड़ी 14, मऊगंज 31, हनुमना 32) में कुल 24,140 गोवंश दर्ज हैं। सरकार प्रति गाय ₹40 प्रतिदिन के मान से महीने का करीब ₹2.90 करोड़ चारा अनुदान देती है। लेकिन जब शिकायतकर्ताओं ने 56 गौशालाओं का भौतिक सत्यापन किया, तो मौके पर सिर्फ 3,278 गायें मिलीं। मलैगवा, बिछरहटा, बेलहा और खैरा जैसी गौशालाओं में एक भी गाय नहीं पाई गई।
  • बेलहा और दामोदरगढ़ की कड़ियाँ: ग्राम पंचायत बेलहा की गौशाला का भवन पूर्ण तक नहीं हुआ, फिर भी वहां ₹42.57 लाख का भुगतान कर दिया गया। संयुक्त जांच रिपोर्ट में शून्य गोवंश होने के बावजूद दो महीने बाद राशि जारी कर दी गई, जिसकी शिकायत उप-सरपंच ने कलेक्टर से की है। ७ नवंबर २०२५ को क्षेत्रीय विधायक प्रदीप पटेल ने इस विधिक मुद्दे पर विधानसभा में सवाल भी दागा था।

रिश्वत के चेक से रीवा में ₹42 लाख की रजिस्ट्री? डिप्टी डायरेक्टर के बेटे के नाम पर संपत्ति का आरोप

इस पूरे कथित घोटाले में सबसे गंभीर विधिक आरोप पशुपालन विभाग के उपसंचालक (डिप्टी डायरेक्टर) डॉ. जे.एल. साकेत पर लगे हैं:

  1. संदेहास्पद चेक ट्रांजेक्शन: शिकायतकर्ताओं ने विधिक दस्तावेजों के हवाले से आरोप लगाया है कि १५ जुलाई २०२५ को चेक क्रमांक 101807 के माध्यम से ₹7 लाख और अन्य चेकों (101808, 101810, 101813) के जरिए ₹5.5 लाख सदानंद पाठक व राम उजागर अवधिया के खातों से होते हुए मकान मालिक तक पहुंचे। यह राशि रीवा में लगभग ₹42 लाख में खरीदे गए एक बंगले की रजिस्ट्री के लिए दी गई थी, जो उपसंचालक के बेटे पुनीत कुमार साकेत के नाम पर है, जिनकी आय का कोई ज्ञात स्रोत नहीं है।
  2. लोकायुक्त और ED जांच की मांग: मामले की विधिक संवेदनशीलता को देखते हुए प्रबुद्ध नागरिकों ने इसकी उच्च स्तरीय जांच प्रवर्तन निदेशालय (ED) या लोकायुक्त से कराने की विधिक मांग की है ताकि बिचौलियों के पूरे सिंडिकेट का पर्दाफाश हो सके।

“आरोप पूरी तरह गलत, साथी से उधार लिया था पैसा” — डिप्टी डायरेक्टर डॉ. जे.एल. साकेत की विधिक सफाई

प्रशासनिक मुस्तैदी और विभागीय पक्ष की कड़ियाँ —

“इस पूरे मामले पर मऊगंज के डिप्टी डायरेक्टर पशु चिकित्सा डॉ. जे.एल. साकेत ने फोन पर विधिक सफाई देते हुए सभी आरोपों को सिरे से खारिज किया है. उन्होंने कहा कि रीवा में बेटे के नाम जो घर खरीदा है, उसके लिए उन्होंने बैंक से बाकायदा लोन (कर्ज) लिया है. वे स्वयं ₹1.5 लाख मासिक वेतन पाते हैं और पर्याप्त कृषि आय है। पैसा घटने पर उन्होंने अपने साथी से चेक के माध्यम से विधिक कर्ज लिया था।

डॉ. साकेत ने स्पष्ट किया कि जब तक गौशालाओं में मवेशी रहे, केवल उसी अवधि का विधिक भुगतान हुआ है, मवेशी न मिलने पर राशि रोक दी गई थी। वे किसी भी विधिक जांच के लिए पूरी तरह तैयार हैं। फिलहाल, मऊगंज कलेक्ट्रेट की विंग इस पूरे शिकायत पत्र का विधिक परीक्षण कर रही है।”

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