बुरहानपुर : मध्य प्रदेश के बुरहानपुर जिले के ग्रामीण अंचल देड़तलाई की दुर्गा उत्सव परंपरा और इससे जुड़े कई अनसुने किस्से आज भी लोगों के जेहन में ताजा हैं। यहां की 58 साल पुरानी दुर्गोत्सव परंपरा केवल आस्था का प्रतीक नहीं है, बल्कि इसके पीछे ग्रामीणों के संघर्ष, सामूहिक श्रम और एक सदी से अधिक पुराने इतिहास की लंबी दास्तान जुड़ी है। ऐसा ही एक चर्चित किस्सा वर्ष 1998 की अष्टमी की रात का है, जब प्रतिमा में कथित हलचल की खबर के बाद पूरे गांव में कौतूहल और भक्ति का माहौल बन गया था।

1998 की अष्टमी की रात: दो बजे अचानक उठी थी प्रतिमा हिलने की बात, उमड़ी थी भीड़
ग्रामीणों और बुजुर्गों के अनुसार, वर्ष 1998 में अष्टमी की रात करीब दो बजे जयस्तंभ चौक स्थित मुख्य दुर्गा पंडाल से अचानक यह खबर फैली कि मां दुर्गा की प्रतिमा में हलचल हो रही है। कुछ ही देर में सैकड़ों ग्रामीण पंडाल में एकत्र हो गए। कुछ श्रद्धालुओं को ऐसा प्रतीत हुआ मानो मां स्वयं गरबा कर रही हों। स्थिति को संभालते हुए स्थानीय पंडितों ने दुर्गा क्षमा प्रार्थना स्तोत्र व दुर्गा चालीसा का पाठ किया और श्रद्धालुओं ने क्षमा-प्रार्थना की, जिसके बाद धीरे-धीरे माहौल पूरी तरह भक्तिमय हो गया। हालांकि, इस घटना की स्वतंत्र पुष्टि नहीं हुई है, लेकिन आज भी 28 साल बाद यह चर्चा का विषय बना रहता है।
1968 में पड़ी थी परंपरा की नींव, लकड़ी के खंभों से मंदिर तक लाई गई थी बिजली
देड़तलाई में सार्वजनिक दुर्गोत्सव की शुरुआत वर्ष 1968 में प्राचीन मंदिर परिसर से हुई थी, जबकि 1975 से जयस्तंभ चौक पर प्रतिमा स्थापना की परंपरा शुरू हुई। शुरुआती दौर में संसाधनों की भारी कमी थी। लगभग 1973 के आसपास गांव में बिजली पहुंची थी, जिसके बाद ग्रामीणों ने खुद लकड़ी के खंभे गाड़कर प्राचीन मंदिर तक अस्थायी बिजली कनेक्शन पहुंचाया था। गांव का पुराना नाम कभी ‘देवतलाई’ हुआ करता था, जो समय के साथ बदलकर ‘देड़तलाई’ प्रसिद्ध हो गया। आज भी यह गांव अपनी अनूठी धार्मिक व सांस्कृतिक विरासत के लिए जाना जाता है।











