मऊगंज: मध्य प्रदेश की डॉ. मोहन यादव सरकार जिस ‘सीएम हेल्पलाइन 181’ (CM Helpline) को सूबे की पीड़ित जनता के न्याय की आखिरी उम्मीद और भ्रष्टाचार के खिलाफ सबसे अचूक हथियार मानती है, मऊगंज पुलिस के एक शातिर सिंडिकेट ने उसे केवल अपनी कागजी रेटिंग और ग्रेडिंग चमकाने का ‘खिलौना’ बना दिया। मऊगंज पुलिस द्वारा बंद कमरों में बैठकर खुद ही फर्जी फरियादी बनने और खुद ही उसका जादुई निपटारा दिखाकर फाइलें बंद करने के इस सनसनीखेज काले कारनामे का भंडाफोड़ हुआ है। मामले के तूल पकड़ते ही मऊगंज पुलिस अधीक्षक (SP) ने आनन-फानन में एक आरक्षक विवेक यादव को लाइन हाजिर कर दिया है, लेकिन अंचल में यह बड़ा सवाल गूंज रहा है कि आखिर इस सिंडिकेट के असली मगरमच्छों पर गाज कब गिरेगी?
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21 मोबाइल नंबरों से ठोक दीं 233 फर्जी शिकायतें
सरकारी रिकॉर्ड में अपनी पीठ थपथपाने के लिए मऊगंज पुलिस के इस सिंडिकेट ने इंसाफ का सरेआम गला घोंटा:
- 6 मिनट में 5 शिकायतें: आला अधिकारियों की आंखों में धूल झोंकने के लिए इस सिंडिकेट ने महज 21 मोबाइल नंबरों का इस्तेमाल करके पिछले कुछ महीनों में 233 फर्जी शिकायतें पोर्टल पर दर्ज करा दीं। रफ्तार इतनी तेज थी कि महज 6 मिनट के भीतर 5-5 शिकायतें ठोक दी जाती थीं।
- संगीन मामलों को बनाया जरिया: अपनी झूठी ग्रेडिंग सुधारने के लिए इस सिंडिकेट ने किडनैपिंग, सरेराह लूट, डकैती और नाबालिग बच्चियों से छेड़छाड़ जैसे बेहद संवेदनशील और संगीन मामलों की झूठी कहानियां गढ़ीं।
जब खाकी के झूठ के परखच्चे उड़े: “साहब! मेरी शादी नहीं हुई, तो बेटी कहां से आएगी?”
इस महा-फर्जीवाड़े का भंडाफोड़ तब हुआ, जब सिंडिकेट ने अति-उत्साह में आकर ‘अंकित चौरसिया’ नाम के एक स्थानीय युवक के नाम पर फर्जी शिकायत दर्ज कर दी। पुलिस ने कागजों में अपनी बहादुरी दिखाने के लिए पूरी स्क्रिप्ट तैयार की कि— ‘अंकित की 20 साल की बेटी स्कूल के लिए निकली और अचानक गायब हो गई, जिसका पुलिस ने तत्काल निराकरण किया।’
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जब मीडिया और स्वतंत्र जांच टीम ने इस शिकायत के सत्यापन के लिए असल फरियादी अंकित चौरसिया से संपर्क किया, तो उसने खाकी के इस सफेद झूठ की धज्जियां उड़ा दीं। अंकित ने कैमरे पर साफ कहा:
“साहब, मेरी तो अभी तक शादी ही नहीं हुई है! मैं पूरी तरह कुंवारा हूँ। जब मेरी शादी ही नहीं हुई, तो मेरी 20 साल की बेटी कहां से आ जाएगी और वो कब गायब हो गई?”
आरक्षक से लेकर ड्राइवर तक फैले हैं सिंडिकेट के तार; ये चेहरे आए सामने
सूत्रों और प्रारंभिक जांच के अनुसार, इस संगठित खेल में सिर्फ एक अदना आरक्षक नहीं, बल्कि पूरा सिंडिकेट काम कर रहा था:
- आरक्षक विवेक यादव: जिसे मामले को दबाने के लिए तत्काल लाइन हाजिर किया गया है।
- प्रवेश चौबे और कृष्णा कुशवाहा: डायल 112 (Dial 112) के ये दोनों कर्मचारी भी इस टेक्निकल फर्जीवाड़े में बराबर के साझीदार बताए जा रहे हैं।
- दयाशंकर तिवारी (पॉकेट गवाह): यह शख्स मऊगंज थाना प्रभारी का निजी ड्राइवर है, जो सरकारी गाड़ी चलाता है। कमाल की बात यह है कि यह ड्राइवर एक ही दिन में पुलिस की डायरी में 9-9 अलग-अलग मामलों में ‘पॉकेट गवाह’ (Pocket Witness) बना पाया गया है।
कटघरे में मऊगंज थाना प्रभारी रीना सिंह; उठे गंभीर सुलगते सवाल
प्रशासनिक जवाबदेही और एल-1 (L1) स्तर पर सवाल —
“सीएम हेल्पलाइन के नियमों के मुताबिक, किसी भी थाने में आने वाली शिकायतों के समय-सीमा में समाधान के लिए सबसे पहली जिम्मेदार यानी एल-1 (L1) अधिकारी खुद थाना प्रभारी होती हैं। ऐसे में सुलगता हुआ सवाल मऊगंज थाने की कमान संभाल रही थाना प्रभारी रीना सिंह पर उठता है:”
- क्या यह मुमकिन है कि मैडम थाना प्रभारी को अपनी नाक के नीचे महीनों से चल रहे इतने बड़े सिंडिकेट की भनक तक नहीं थी?
- क्या अपनी कुर्सी बचाने और मऊगंज थाने की सीएम हेल्पलाइन रैंकिंग को टॉप पर रखने के लिए इस पूरे खेल को उनकी मौन सहमति मिली हुई थी?
- थाना प्रभारी ने एक बाहरी व्यक्ति दयाशंकर तिवारी को थाने में किस हैसियत से रखा था, जिससे सरकारी गाड़ियां चलवाई जा रही थीं और उसे थोक के भाव गवाह बनाया जा रहा था?
- आखिर मुख्य निराकरण अधिकारी और बड़े चेहरों को बचाने के लिए सिर्फ छोटे आरक्षक की बलि क्यों चढ़ाई जा रही है?
रीवा आईजी गौरव राजपूत का बयान: जांच जारी, बख्शे नहीं जाएंगे दोषी
एक तरफ जहां मध्य प्रदेश की मोहन यादव सरकार जिला कलेक्टरों और कप्तानों से ब्लैकमेलरों और झूठी शिकायत कर शासन का समय बर्बाद करने वालों की लिस्ट मांग रही है, वहीं मऊगंज में खुद कानून के रखवाले ही सबसे बड़े ‘जालसाज और झूठे शिकायतकर्ता’ बनकर सामने आए हैं। इस पूरे मामले में रीवा जोन के पुलिस महानिरीक्षक (IG) गौरव राजपूत का कहना है कि मामले की उच्च स्तरीय जांच जारी है और जो भी दोषी पाया जाएगा, उस पर सख्त दंडात्मक कार्रवाई होगी। अब देखना होगा कि मुख्यमंत्री की इस बेहद महत्वाकांक्षी योजना को पलीता लगाने वाले इन वर्दीधारी ‘मगरमच्छों’ पर कानून का डंडा कब चलता है।









