शाजापुर (ब्यूरो रिपोर्ट): मध्य प्रदेश के शाजापुर जिले से बेरोजगार युवाओं की लाचारी और मजबूरी का फायदा उठाकर करोड़ों के सपने बेचने वाले ठगों का एक बेहद सनसनीखेज मामला सामने आया है। जिले के विभिन्न ग्रामीण अंचलों के सैकड़ों नौजवानों को सरकारी और अर्ध-सरकारी विभागों में पक्की नौकरी दिलाने का झांसा देकर लाखों रुपये ऐंठ लिए गए। जब महीनों बीत जाने के बाद भी न तो जॉइनिंग लेटर मिला और न ही पैसे वापस हुए, तो ठगे गए युवाओं के पैरों तले जमीन खिसक गई। मंगलवार को अपनी गाढ़ी कमाई गंवा चुके पीड़ित युवाओं का एक बड़ा हुजूम जिला कलेक्ट्रेट कार्यालय में आयोजित जनसुनवाई में पहुंचा और अधिकारियों के सामने न्याय की गुहार लगाते हुए अपनी व्यथा सुनाई।

सिडको (SIDCO) और ग्राम पंचायत में नौकरी का दिया लालच
जनसुनवाई में पहुंचे पीड़ित युवाओं और शिकायतकर्ताओं के अनुसार, इस संगठित ठगी को बेहद शातिर तरीके से अंजाम दिया गया:
- नौकरी के नाम पर अलग-अलग रेट: पीड़ितों का आरोप है कि आरोपियों ने युवाओं की योग्यता के हिसाब से किसी से 35 हजार, किसी से 18 हजार, तो किसी से 10 हजार और 7,500 रुपये तक की अवैध वसूली की।
- 300 से अधिक शिकार, 42 लाख की चपत: प्रारंभिक तौर पर सामने आया है कि जालसाजों ने जिले के लगभग 300 से अधिक सीधे-साधे और बेरोजगार युवाओं को अपने जाल में फंसाया। इस तरह नौकरी के नाम पर कुल करीब 42 लाख रुपये का मोटा फंड एकत्र कर लिया गया।

शिवराज सिंह और अजहर पठान सहित 3 पर ठगी का संगीन आरोप; नंबर किए ब्लॉक
पीड़ितों ने अपने शिकायती पत्र में इलाके के ही तीन मुख्य चेहरों को नामजद करते हुए इस महा-फर्जीवाड़े का मास्टरमाइंड बताया है:
- ये हैं नामजद आरोपी: शिकायत के अनुसार, धोखाधड़ी के इस खेल में शिवराज सिंह राजपूत (निवासी: ग्राम जादमी), अजहर पठान (निवासी: ग्राम सुनेरा) और सोनू मिर्जा (निवासी: मुल्लाखेड़ी) मुख्य रूप से शामिल हैं।
- पैसे मिलते ही हुए अंडरग्राउंड: युवाओं ने बताया कि जब उन्होंने काम न होने पर अपने पैसे वापस मांगे, तो आरोपियों ने पहले टालमटोल की और बाद में अपने मोबाइल फोन बंद कर लिए। कइयों के नंबर तो आरोपियों ने ब्लैकलिस्ट (ब्लॉक) में डाल दिए हैं, जिससे पीड़ितों का उनसे संपर्क पूरी तरह कट गया है।
कोतवाली और एसपी दफ्तर में नहीं हुई सुनवाई, तो पहुंचे कलेक्टर के द्वार
ग्राउंड रिपोर्ट और पीड़ितों का तल्ख सवाल —
“जनसुनवाई में पहुंचे युवाओं ने भरे गले से बताया कि वे इस ठगी का शिकार होने के बाद न्याय के लिए स्थानीय कोतवाली थाना और पुलिस अधीक्षक (SP) कार्यालय के चक्कर काट-काट कर थक चुके हैं, लेकिन पुलिसिया सुस्ती के चलते अब तक आरोपियों पर कोई ठोस कानूनी शिकंजा नहीं कसा जा सका। थक-हारकर वे कलेक्टर की चौपाल में पहुंचे हैं। फिलहाल, प्रशासनिक अधिकारियों ने मामले को गंभीरता से लेते हुए इसकी निष्पक्ष और उच्च स्तरीय जांच के निर्देश दिए हैं, जिसके बाद ही वास्तविक स्थिति और स्पष्ट हो सकेगी।”
संपादकीय टिप्पणी: कब जागेगा हमारा सिस्टम?
यह सिर्फ 42 लाख रुपये की ठगी का मामला नहीं है, बल्कि यह उन 300 परिवारों के भरोसे की हत्या है जिन्होंने अपने बच्चों के बेहतर भविष्य के लिए कर्ज लेकर या जमीन गिरवी रखकर यह रकम इन ठगों को सौंपी थी। जरा सोचिए, जो शातिर अपराधी इन बेरोजगारों के सपने बेचकर रफूचक्कर हो गए, उनके हौसले इतने बुलंद हैं कि उन्हें कानून का कोई खौफ नहीं है। पर जिन्होंने अपने सुनहरे भविष्य की उम्मीद में ये सपने खरीदे थे, उनकी आंखें आज सिस्टम के दरवाजे पर नम हैं। सवाल यह है कि आखिर कब तक देश और प्रदेश के बेरोजगार जवानों की मजबूरी को हथियार बनाकर ठगी का यह गंदा खेल चलता रहेगा? और हमारा सोया हुआ प्रशासनिक अमला आखिर कब पूरी तरह जागेगा?







