रीवा: मध्य प्रदेश के Rewa जिले में सहकारिता विभाग से जुड़ा एक कथित बड़ा भूमि घोटाला सामने आया है। अल्प आय वर्ग गृह निर्माण सहकारी समिति मर्यादित, रीवा से जुड़ा यह मामला अब प्रदेश के सहकारिता विभाग और प्रशासनिक व्यवस्था पर गंभीर सवाल खड़े कर रहा है। आरोप है कि समिति की 200 एकड़ से अधिक जमीन की खरीद-फरोख्त में बड़े पैमाने पर आर्थिक अनियमितताएं की गईं। इस पूरे मामले में करीब 1000 करोड़ रुपये के घोटाले की आशंका जताई जा रही है। सबसे चौंकाने वाला आरोप यह है कि करीब 29 लाख रुपये में कागजों पर दिखाई गई जमीन को उसी दिन 6 करोड़ रुपये में बेच दिया गया। इस तरह जमीन के वास्तविक मूल्य और दस्तावेजों में दर्ज रकम के बीच भारी अंतर सामने आया है।
कांग्रेस नेताओं ने इस मामले को उजागर करते हुए आरोप लगाया है कि सहकारी समिति की जमीनों को योजनाबद्ध तरीके से कम कीमत पर खरीदने और बाद में कई गुना अधिक कीमत पर बेचने का खेल किया गया। इसमें कुछ रसूखदार लोगों और बिल्डरों को लाभ पहुंचाने का आरोप है। मामले की गंभीरता को देखते हुए तत्कालीन संभागायुक्त ने विशेष जांच दल का गठन किया था। जांच दल ने अपनी रिपोर्ट भी सौंप दी, जिसमें आर्थिक अनियमितताओं की पुष्टि होने की बात सामने आई है। इसके बावजूद अब तक जिम्मेदार लोगों के खिलाफ ठोस कार्रवाई नहीं होने से शिकायतकर्ता और राजनीतिक दलों में नाराजगी है।
29 लाख की जमीन उसी दिन 6 करोड़ में बेचने का आरोप
इस पूरे मामले में सबसे गंभीर और चौंकाने वाला आरोप जमीन की खरीद-बिक्री में भारी मूल्य अंतर को लेकर है। कांग्रेस नेताओं के मुताबिक, अल्प आय वर्ग गृह निर्माण सहकारी समिति की एक जमीन को दस्तावेजों में महज 29 लाख रुपये में खरीदा हुआ दिखाया गया। लेकिन आरोप है कि उसी जमीन को उसी दिन करीब 6 करोड़ रुपये में आगे बेच दिया गया।
यदि इन आरोपों की पुष्टि होती है तो यह केवल जमीन की खरीद-बिक्री का सामान्य मामला नहीं, बल्कि सहकारी संस्था की संपत्ति के कथित दुरुपयोग और बड़े आर्थिक लाभ का गंभीर मामला बन सकता है। सवाल यह भी उठता है कि आखिर जमीन के वास्तविक बाजार मूल्य और दस्तावेजों में दर्ज कीमत के बीच इतना बड़ा अंतर कैसे रहा? क्या जमीन की खरीद-बिक्री में नियमों का पालन किया गया था? क्या समिति के सदस्यों और संबंधित अधिकारियों की सहमति ली गई थी? इन तमाम बिंदुओं की निष्पक्ष जांच जरूरी है।
200 एकड़ से अधिक जमीन की खरीद-फरोख्त पर सवाल
शिकायत में आरोप लगाया गया है कि यह मामला केवल एक जमीन के सौदे तक सीमित नहीं है। अल्प आय वर्ग गृह निर्माण सहकारी समिति की 200 एकड़ से अधिक जमीन की खरीद-फरोख्त में अनियमितताएं की गईं। कांग्रेस नेताओं का दावा है कि जमीनों के लेन-देन में इस तरह की प्रक्रिया अपनाई गई, जिससे कुछ प्रभावशाली लोगों और बिल्डरों को आर्थिक फायदा पहुंचा।
करीब 1000 करोड़ रुपये के कथित घोटाले की आशंका जताए जाने के बाद इस मामले ने और गंभीर रूप ले लिया है। हालांकि, इस राशि से जुड़े आरोपों और प्रत्येक जमीन के सौदे की वास्तविक स्थिति का निर्धारण संबंधित दस्तावेजों, राजस्व रिकॉर्ड, रजिस्ट्री और जांच के निष्कर्षों के आधार पर होना बाकी है।
सहकारी गृह निर्माण समितियों का मूल उद्देश्य आम नागरिकों, विशेषकर आर्थिक रूप से कमजोर और निम्न आय वर्ग के लोगों को आवास उपलब्ध कराने में मदद करना होता है। ऐसे में यदि किसी समिति की जमीनों के लेन-देन में अनियमितता हुई है तो इसका सीधा असर उन लोगों के हितों पर भी पड़ सकता है, जिनके लिए ऐसी संस्थाओं का गठन किया जाता है।
11 दिसंबर 2024 को गठित हुई थी जांच टीम
मामले की शिकायत सामने आने के बाद तत्कालीन संभागायुक्त बी.एम. जामोद ने 11 दिसंबर 2024 को विशेष जांच दल (एसआईटी) का गठन किया था। इस जांच दल में प्रशासन और वित्तीय मामलों से जुड़े वरिष्ठ अधिकारियों को शामिल किया गया था।
जांच टीम में निम्न अधिकारियों को जिम्मेदारी दी गई थी:
- एसडीएम हुजूर।
- संयुक्त संचालक, कोष एवं लेखा।
- संयुक्त आयुक्त, सहकारिता।
जांच दल को समिति की जमीनों से जुड़े दस्तावेजों, आर्थिक लेन-देन और कथित अनियमितताओं की जांच करने की जिम्मेदारी सौंपी गई थी। इसका उद्देश्य यह पता लगाना था कि जमीनों की खरीद-बिक्री किस प्रक्रिया के तहत हुई, किन लोगों को इसका लाभ मिला और कहीं नियमों का उल्लंघन तो नहीं किया गया।
20 फरवरी 2026 को सौंपी गई संयुक्त जांच रिपोर्ट
विशेष जांच दल ने मामले की जांच के बाद 20 फरवरी 2026 को अपनी संयुक्त जांच रिपोर्ट सौंप दी। शिकायतकर्ताओं के अनुसार, इस रिपोर्ट में आर्थिक अनियमितताओं की पुष्टि की गई है। इसके बाद उम्मीद जताई जा रही थी कि प्रशासन मामले में आगे की कार्रवाई करेगा और जिन लोगों की भूमिका संदिग्ध पाई गई है, उनके खिलाफ कानूनी प्रक्रिया शुरू होगी।
लेकिन जांच रिपोर्ट सौंपे जाने के बाद भी कार्रवाई नहीं होने का आरोप लगाया जा रहा है। शिकायतकर्ताओं का कहना है कि जब विशेष जांच दल ने जांच पूरी कर अपनी रिपोर्ट प्रशासन को सौंप दी है तो फिर कार्रवाई में देरी क्यों हो रही है? क्या रिपोर्ट के आधार पर जिम्मेदार लोगों की भूमिका तय नहीं की जा सकती? क्या किसी स्तर पर फाइल को दबाकर रखा गया है?
इन सवालों को लेकर अब प्रशासनिक कार्यप्रणाली पर भी सवाल उठने लगे हैं।
आठ महीने बाद भी कार्रवाई नहीं, शिकायतकर्ताओं में नाराजगी
जांच रिपोर्ट सौंपे जाने के बाद करीब आठ महीने बीत जाने के बावजूद दोषियों के खिलाफ एफआईआर दर्ज नहीं होने से शिकायतकर्ता नाराज हैं। उनका आरोप है कि इतने बड़े आर्थिक मामले में जांच पूरी होने के बाद भी कार्रवाई नहीं होना समझ से परे है।
शिकायतकर्ता कुंवर सिंह पटेल और विनोद शर्मा ने इस मामले को लेकर संभागायुक्त रीवा को ज्ञापन सौंपा है। उन्होंने मांग की है कि विशेष जांच दल की संयुक्त रिपोर्ट के आधार पर तत्काल एफआईआर दर्ज कराई जाए और मामले में शामिल सभी जिम्मेदार लोगों के खिलाफ सख्त कानूनी कार्रवाई की जाए।
शिकायतकर्ताओं का कहना है कि यदि जांच में आर्थिक अनियमितताएं सामने आई हैं तो अब केवल जांच रिपोर्ट तक सीमित रहने के बजाय दोषियों की जवाबदेही तय की जानी चाहिए। साथ ही समिति की जमीनों से जुड़े सभी संदिग्ध सौदों की जांच कर वास्तविक नुकसान और लाभार्थियों का पता लगाया जाना चाहिए।
कांग्रेस ने उठाए प्रशासन की कार्यप्रणाली पर सवाल
कांग्रेस नेताओं ने इस मामले को सहकारिता विभाग का बड़ा घोटाला बताते हुए प्रशासन से जवाब मांगा है। उनका आरोप है कि समिति की जमीनों के लेन-देन में प्रभावशाली लोगों को लाभ पहुंचाने के लिए नियमों की अनदेखी की गई। कांग्रेस ने पूरे मामले की निष्पक्ष जांच कराने और दोषियों के खिलाफ कठोर कार्रवाई की मांग की है।
कांग्रेस नेताओं का कहना है कि जब एक विशेष जांच दल गठित किया गया, अधिकारियों ने जांच की और संयुक्त रिपोर्ट भी सौंप दी, तो फिर कार्रवाई में देरी का कोई औचित्य नहीं है। यदि रिपोर्ट में अनियमितताओं का उल्लेख है तो संबंधित लोगों के खिलाफ कानूनी प्रक्रिया शुरू की जानी चाहिए।
राजनीतिक स्तर पर भी इस मामले को लेकर सवाल उठने लगे हैं। विपक्ष का कहना है कि सहकारी संस्थाओं की संपत्ति जनता के हितों के लिए होती है। यदि ऐसी संपत्ति के लेन-देन में गड़बड़ी हुई है तो इसकी जवाबदेही तय करना प्रशासन की जिम्मेदारी है।
जांच रिपोर्ट के आधार पर एफआईआर की मांग
शिकायतकर्ताओं ने संभागायुक्त को सौंपे गए ज्ञापन में मुख्य रूप से तीन मांगें उठाई हैं। पहली, विशेष जांच दल की 20 फरवरी 2026 की संयुक्त रिपोर्ट के आधार पर तत्काल एफआईआर दर्ज की जाए। दूसरी, जमीनों की खरीद-फरोख्त में शामिल सभी संबंधित व्यक्तियों और जिम्मेदार अधिकारियों की भूमिका की जांच की जाए। तीसरी, समिति की जमीनों के कथित अवैध हस्तांतरण और आर्थिक अनियमितताओं से हुए नुकसान का आकलन कर दोषियों से जवाबदेही तय की जाए।
उनका कहना है कि मामले की निष्पक्ष जांच के लिए जमीनों की रजिस्ट्री, मूल्यांकन रिपोर्ट, भुगतान के दस्तावेज, समिति की बैठक के प्रस्ताव और संबंधित अधिकारियों की अनुमति से जुड़े रिकॉर्ड की गहन जांच होनी चाहिए।
कई बड़े सवालों के जवाब का इंतजार
Rewa का यह कथित सहकारिता घोटाला अब कई महत्वपूर्ण सवाल खड़े कर रहा है। यदि जमीन 29 लाख रुपये में खरीदी गई और उसी दिन 6 करोड़ रुपये में बेची गई तो इस सौदे की वास्तविक परिस्थितियां क्या थीं? 200 एकड़ से अधिक जमीन के लेन-देन में किन लोगों की भूमिका रही? करीब 1000 करोड़ रुपये के कथित घोटाले का वास्तविक वित्तीय आधार क्या है? जांच रिपोर्ट सौंपे जाने के बाद भी कार्रवाई क्यों नहीं हुई? क्या प्रशासन अब इस मामले में एफआईआर दर्ज कराएगा?
इन सवालों के जवाब सामने आना जरूरी है। फिलहाल शिकायतकर्ता कार्रवाई की मांग पर अड़े हैं और कांग्रेस ने भी मामले को लेकर आवाज बुलंद की है।
अब निगाहें Rewa संभाग के प्रशासनिक अधिकारियों पर टिकी हैं कि वे जांच रिपोर्ट के आधार पर आगे क्या कदम उठाते हैं। यदि आरोप सही साबित होते हैं तो यह मामला न केवल सहकारिता विभाग की कार्यप्रणाली, बल्कि जमीनों के लेन-देन में पारदर्शिता और आम लोगों के हितों की सुरक्षा के लिहाज से भी बेहद महत्वपूर्ण साबित हो सकता है।











