रीवा: Singrauli मध्यप्रदेश में सरकारी निर्माण कार्यों में कथित वित्तीय अनियमितताओं का एक और मामला सामने आया है। आर्थिक अपराध प्रकोष्ठ (EOW) की रीवा इकाई ने सिंगरौली जिले में म्यार नदी पर पुल निर्माण से जुड़े मामले में बड़ी कार्रवाई करते हुए लोक निर्माण विभाग (PWD) सेतु निर्माण के दो तत्कालीन अधिकारियों और रीवा के एक ठेकेदार के खिलाफ प्राथमिकी (FIR) दर्ज की है। जांच में आरोप है कि पुल निर्माण के अंतिम बिल में कूटरचना कर शासन को 33 लाख 53 हजार 439 रुपये की वित्तीय क्षति पहुंचाने का प्रयास किया गया।
मामला चाचर से कुल्हनिया मार्ग पर म्यार नदी में पुल और पहुंच मार्ग के निर्माण से जुड़ा है। आरोप है कि निर्माण कार्य में निर्धारित समय से देरी होने और अन्य अनियमितताओं के कारण ठेकेदार पर पेनाल्टी लगाए जाने की स्थिति थी। इसी पेनाल्टी से बचने के लिए अधिकारियों और ठेकेदार के बीच कथित सांठगांठ कर सरकारी दस्तावेजों में हेराफेरी की गई। जांच एजेंसी के अनुसार, 7 लाख 37 हजार 861 रुपये के मूल अंतिम बिल को बदलकर 40 लाख 91 हजार 300 रुपये का संशोधित बिल तैयार किया गया।
574.32 लाख रुपये की थी पुल निर्माण परियोजना
EOW की जांच के दायरे में आया निर्माण कार्य सिंगरौली जिले के चाचर से कुल्हनिया मार्ग पर म्यार नदी में पुल और पहुंच मार्ग के निर्माण से संबंधित है। इस परियोजना की मूल संविदा लागत 574.32 लाख रुपये निर्धारित की गई थी।
निर्माण कार्य का ठेका 5 फरवरी 2016 को मेसर्स विजय कुमार मिश्रा कंस्ट्रक्शन प्राइवेट लिमिटेड, रीवा को दिया गया था। संविदा के अनुसार ठेकेदार को 18 महीने के भीतर काम पूरा करना था। इसके लिए 4 अप्रैल 2018 की समय-सीमा तय की गई थी।
हालांकि, ठेकेदार ने निर्धारित समय पर निर्माण कार्य पूरा नहीं किया। उपलब्ध जानकारी के मुताबिक, काम लगभग चार महीने की देरी से 1 अगस्त 2018 को पूरा हुआ। निर्माण में हुई इस देरी के कारण पेनाल्टी और अन्य कटौतियों का मामला सामने आया, जो आगे चलकर कथित वित्तीय हेराफेरी की जांच का प्रमुख आधार बना।
मूल अंतिम बिल था 7.37 लाख रुपये का
EOW के सत्यापन में सामने आया कि जनवरी 2019 में तत्कालीन अनुविभागीय अधिकारी (SDO) सुशील कुमार मिश्रा ने 7 लाख 37 हजार 861 रुपये का अंतिम बिल भुगतान के लिए प्रस्तुत किया था।
दूसरी ओर, कार्य के अंकेक्षण के दौरान निर्माण में देरी, टेस्ट रिपोर्ट उपलब्ध नहीं कराने और अन्य मदों से संबंधित आपत्तियां सामने आई थीं। इन आधारों पर अंकेक्षक ने कुल 16 लाख 78 हजार 437 रुपये की कटौती यानी पेनाल्टी निर्धारित की थी।
जांच एजेंसी के अनुसार, इतनी बड़ी कटौती से बचने के लिए अंतिम बिल और निर्माण कार्य से जुड़े सरकारी अभिलेखों में कथित रूप से बदलाव किए गए। आरोप है कि मूल बिल को बदलकर अधिक राशि का बिल तैयार किया गया, ताकि पेनाल्टी का प्रभाव समाप्त किया जा सके और शासन को आर्थिक नुकसान पहुंचाया जा सके।
7.37 लाख का बिल बदलकर 40.91 लाख रुपये किया
इस मामले में सबसे महत्वपूर्ण आरोप अंतिम बिल में कूटरचना का है। EOW के अनुसार, 7 लाख 37 हजार 861 रुपये के मूल अंतिम बिल के स्थान पर 40 लाख 91 हजार 300 रुपये का संशोधित बिल तैयार किया गया।
दोनों बिलों की राशि के बीच 33 लाख 53 हजार 439 रुपये का अंतर है। जांच एजेंसी का आरोप है कि यह बदलाव सामान्य लेखा प्रक्रिया का हिस्सा नहीं था, बल्कि पेनाल्टी से बचने और अनुचित आर्थिक लाभ प्राप्त करने के उद्देश्य से किया गया।
जांच में यह भी सामने आया कि 40 लाख 91 हजार 300 रुपये का कथित कूटरचित बिल 1 नवंबर 2018 की बैकडेट में तैयार किया गया था। EOW के अनुसार, इस प्रक्रिया का उद्देश्य पेनाल्टी की राशि को शून्य करना और शासन को वित्तीय क्षति पहुंचाना था।
सरकारी माप पुस्तिका गायब
निर्माण कार्यों में माप पुस्तिका (Measurement Book-MB) महत्वपूर्ण सरकारी दस्तावेज होती है। इसमें किए गए निर्माण कार्य का विवरण, माप और उससे संबंधित भुगतान का आधार दर्ज रहता है। इसी दस्तावेज के आधार पर निर्माण की वास्तविक स्थिति और ठेकेदार के देयक का सत्यापन किया जाता है।
EOW की जांच में आरोप है कि इस मामले में निर्माण कार्य से संबंधित महत्वपूर्ण माप पुस्तिका क्रमांक 605 गायब कर दी गई। वहीं, माप पुस्तिका क्रमांक 606 और 734 में ओवरराइटिंग और काट-छांट किए जाने के संकेत मिले।
जांच एजेंसी के अनुसार, इन दस्तावेजों में कथित हेराफेरी का उद्देश्य निर्माण कार्य के वास्तविक रिकॉर्ड और भुगतान संबंधी विवरणों को प्रभावित करना था। माप पुस्तिकाओं में गड़बड़ी और अंतिम बिल में अंतर सामने आने के बाद मामले की गंभीरता बढ़ गई।
पेनाल्टी से बचने के लिए रची गई कथित साजिश
EOW की जांच के मुताबिक, निर्माण कार्य निर्धारित समय-सीमा से लगभग चार महीने देर से पूरा हुआ था। इसके अलावा टेस्ट रिपोर्ट उपलब्ध नहीं कराने और अन्य मदों में अनियमितताओं के कारण अंकेक्षक ने 16.78 लाख रुपये से अधिक की कटौती निर्धारित की थी।
आरोप है कि इसी आर्थिक दायित्व से बचने के लिए तत्कालीन अधिकारियों और ठेकेदार के बीच मिलीभगत हुई। सरकारी माप पुस्तिका गायब करने, अन्य अभिलेखों में काट-छांट करने और बिल को बैकडेट में तैयार करने जैसी गतिविधियों के जरिए कथित रूप से रिकॉर्ड में बदलाव किया गया।
EOW का मानना है कि इस पूरी प्रक्रिया का उद्देश्य सरकारी खजाने को नुकसान पहुंचाकर संबंधित पक्षों को अनुचित लाभ पहुंचाना था। हालांकि, मामले में आरोपों की अंतिम पुष्टि जांच और न्यायिक प्रक्रिया के बाद ही होगी।
तत्कालीन SDO उपयंत्री और ठेकेदार पर FIR
EOW की रीवा इकाई ने इस मामले में तत्कालीन SDO सुशील कुमार मिश्रा, तत्कालीन उपयंत्री चंद्रशेखर तिवारी और संविदाकार मेसर्स विजय कुमार मिश्रा कंस्ट्रक्शन प्राइवेट लिमिटेड, रीवा तथा अन्य के विरुद्ध FIR दर्ज की है।
आरोपियों के खिलाफ भारतीय दंड संहिता की धारा 409, 420, 467, 468, 471 और 120-बी के तहत प्रकरण पंजीबद्ध किया गया है। इसके अलावा भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम, 1988 (संशोधित 2018) की धारा 7-सी, 13(1)(ए) और 13(2) के तहत भी मामला दर्ज किया गया है।
इन धाराओं के तहत आपराधिक न्यासभंग, धोखाधड़ी, दस्तावेजों की कूटरचना, कूटरचित दस्तावेजों के उपयोग और आपराधिक षड्यंत्र सहित भ्रष्टाचार से संबंधित आरोपों की जांच की जाएगी।
EOW ने विवेचना में लिया मामला
FIR दर्ज करने के बाद EOW ने प्रकरण को विवेचना में ले लिया है। अब जांच एजेंसी निर्माण कार्य से संबंधित माप पुस्तिकाओं, अंतिम देयक तैयार करने की प्रक्रिया, भुगतान के अभिलेखों और अंकेक्षण रिपोर्ट की पड़ताल करेगी।
जांच में यह पता लगाने का प्रयास किया जाएगा कि मूल बिल में बदलाव किस स्तर पर और किसके निर्देश पर किया गया। साथ ही यह भी जांच की जाएगी कि कथित कूटरचित बिल के आधार पर कोई भुगतान हुआ था या नहीं और इस प्रक्रिया में किन-किन अधिकारियों तथा अन्य लोगों की भूमिका रही।
दस्तावेजों की जांच के साथ संबंधित अधिकारियों और ठेकेदार से पूछताछ भी की जा सकती है। जरूरत पड़ने पर माप पुस्तिकाओं और बिलों की फॉरेंसिक जांच कराई जाएगी, ताकि ओवरराइटिंग, काट-छांट और दस्तावेज तैयार किए जाने की प्रक्रिया से जुड़े तथ्यों का पता लगाया जा सके।
जांच के दायरे में आ सकते हैं अन्य लोग
इस मामले में अभी तक दर्ज FIR में दो तत्कालीन अधिकारियों और ठेकेदार का नाम सामने आया है। हालांकि, विवेचना के दौरान भुगतान प्रक्रिया, दस्तावेजों के रखरखाव और कथित हेराफेरी में अन्य लोगों की भूमिका की भी जांच की जाएगी।
म्यार नदी पुल निर्माण से जुड़ा यह मामला सरकारी निर्माण कार्यों में पारदर्शिता, जवाबदेही और दस्तावेजों के सुरक्षित रखरखाव की आवश्यकता को भी सामने लाता है। अब सभी की नजर EOW की आगे की जांच पर है, जिससे यह स्पष्ट हो सकेगा कि कथित हेराफेरी किस तरह की गई और इसमें किन लोगों की वास्तविक भूमिका रही।











