मैहर। मैहर जिले के रामनगर नगर परिषद के वार्ड 4 का करौंदिया गांव बना टापू। लगातार बारिश के बाद नदी उफान पर है। रास्ते प्रभावित हैं। ग्रामीणों को आवागमन में परेशानी हो रही है। सड़क और पुल की पुरानी समस्या एक बार फिर सामने आ गई है।
लेकिन करौंदिया की कहानी आज की नहीं है।
ग्रामीणों के मुताबिक, सड़क और पुल निर्माण को लेकर कई बार आश्वासन मिल चुके हैं। अधिकारियों और जनप्रतिनिधियों से समाधान की उम्मीद भी जगी। इसके बावजूद जमीन पर स्थिति अब भी जस की तस बनी हुई है।
नदी हर साल उफनती है। पानी हर साल उतर जाता है। लेकिन करौंदिया की सड़क का इंतजार खत्म नहीं होता।
करौंदिया गांव में सड़क खराब
सड़क नहीं, आश्वासन की सप्लाई भरपूर
करौंदिया में सड़क की समस्या पुरानी बताई जा रही है। बारिश शुरू होते ही ग्रामीणों की परेशानी बढ़ जाती है। नदी का जलस्तर बढ़ता है और आवागमन प्रभावित हो जाता है।
ऐसे में सवाल उठना स्वाभाविक है।
सड़क नहीं बनी तो आश्वासन इतनी तेजी से कैसे पहुंच जाते हैं?
लगता है करौंदिया में सड़क से ज्यादा मजबूत आश्वासन की व्यवस्था है। बारिश आती है। नदी बहती है। ग्रामीण परेशान होते हैं। उम्मीद फिर जगती है।
इसके बाद पानी उतर जाता है।
और सवाल फिर किसी फाइल के पन्नों में दब जाता है।

निरीक्षण होता है, समाधान कब होगा?
ग्रामीणों के अनुसार, कलेक्टर और एसडीएम स्तर तक समस्या की जानकारी पहुंचाई गई। रामनगर नगर परिषद के पूर्व सीएमओ लालजी ताम्रकार और नगर परिषद अध्यक्ष दीपा दीपू मिश्रा सहित जनप्रतिनिधियों से भी सड़क और पुल की मांग की गई।
अब सवाल सीधा है।
अगर समस्या पता है तो समाधान कब होगा?
निरीक्षण से स्थिति सामने आ सकती है। बैठक में चर्चा हो सकती है। प्रस्ताव भी तैयार हो सकता है।
लेकिन ग्रामीणों की जिंदगी तब बदलेगी, जब सड़क जमीन पर दिखाई देगी और नदी पर पुल खड़ा होगा।

फाइलों में पुल या नदी पर पुल?
वार्ड 4 के करौंदिया की स्थिति देखकर एक सवाल जरूर उठता है। सड़क आखिर कब जमीन तक पहुंचेगी? पुल कब नदी के ऊपर दिखाई देगा?
ग्रामीणों को फाइल नहीं चाहिए।
उन्हें प्रस्ताव नहीं चाहिए।
उन्हें सुरक्षित रास्ता चाहिए।
कागज पर बना पुल ग्रामीणों को नदी पार नहीं करा सकता।
यही करौंदिया की सबसे बड़ी परेशानी और जिम्मेदारों के सामने सबसे बड़ा सवाल है।
पक्का मकान, लेकिन रास्ता कच्चा
रामनगर नगर परिषद क्षेत्र में प्रधानमंत्री आवास योजना के तहत कई परिवारों को पक्के मकान मिलने की बात सामने आती है।
यह जरूरतमंद परिवारों के लिए राहत की बात है। लेकिन इसके साथ एक सवाल भी खड़ा होता है।
जब सरकार घर तक पहुंच गई, तो सड़क घर तक क्यों नहीं पहुंची?
पक्का मकान सुरक्षा देता है। लेकिन सुरक्षित सड़क भी उतनी ही जरूरी है। बारिश में रास्ता प्रभावित हो जाए तो ग्रामीणों की परेशानी बढ़ जाती है।
मकान पक्का है। रास्ता कच्चा है। योजना पक्की है। व्यवस्था अब भी सवालों में है।
करौंदिया गांव में सड़क की समस्या
बारिश आते ही करौंदिया की समस्या और गंभीर हो जाती है। नदी उफान पर आती है। रास्ते प्रभावित होते हैं। ग्रामीणों का आवागमन मुश्किल हो जाता है।
सबसे बड़ी चिंता आपात स्थिति की है।
अगर किसी बीमार व्यक्ति को अस्पताल ले जाना पड़े तो क्या होगा?
अगर किसी बुजुर्ग को तत्काल इलाज की जरूरत पड़े तो रास्ता कौन देगा?
अगर किसी बच्चे को मदद की जरूरत पड़े तो परिवार क्या करेगा?
क्या स्थायी समाधान के लिए किसी बड़ी घटना का इंतजार किया जा रहा है?
यह सवाल ग्रामीणों के साथ-साथ जिम्मेदार व्यवस्था से भी है।
अब आश्वासन नहीं, काम चाहिए
करौंदिया के ग्रामीण अब सिर्फ भरोसा नहीं चाहते।
उन्हें तारीख चाहिए।
उन्हें निर्माण चाहिए।
उन्हें सड़क चाहिए।
उन्हें नदी पर पुल चाहिए।
निरीक्षण की तस्वीरें बहुत हो गईं। अब निर्माण की तस्वीर दिखाई देनी चाहिए।
बैठकों की बातें बहुत हो गईं। अब जमीन पर काम दिखाई देना चाहिए।
आश्वासन बहुत हो गए। अब समाधान चाहिए।
जिम्मेदारों से करौंदिया के सीधे सवाल
करौंदिया पूछ रहा है
जब समस्या हर साल आती है तो समाधान हर साल क्यों टलता है?
जब रास्ता हर बारिश में प्रभावित होता है तो स्थायी पुल कब बनेगा?
जब समस्या पहले से पता है तो स्थायी तैयारी कब होगी?
अगर पक्का मकान दिया गया है तो सुरक्षित रास्ता कब मिलेगा?
और सबसे बड़ा सवाल
क्या करौंदिया सिर्फ आश्वासन पाने के लिए है या विकास पाने के लिए भी?
नदी का पानी उतरेगा, सवाल नहीं
बारिश थम जाएगी। नदी का पानी भी उतर जाएगा। रास्ते फिर खुल जाएंगे।
लेकिन करौंदिया का सवाल वहीं रहेगा।
क्योंकि पानी का बढ़ना प्राकृतिक है। लेकिन एक ही समस्या का हर बारिश में दोहराया जाना व्यवस्था पर सवाल खड़ा करता है।
ग्रामीणों को अब नया आश्वासन नहीं चाहिए।
उन्हें ऐसा काम चाहिए, जिसे देखकर सवाल खुद खत्म हो जाएं।
साहब, नदी का पानी तो हर साल उतर जाता है। अब आपके आश्वासन का पानी कब उतरेगा?
करौंदिया इंतजार कर रहा है।
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