सतना। सतना कलेक्टर सतीश कुमार एस ने चित्रकूट में बाढ़ और लगातार बारिश के बीच राहत एवं बचाव कार्यों की लगातार निगरानी की। करीब छह दिनों तक प्रशासनिक टीम के साथ वे प्रभावित इलाकों में पहुंचते रहे और मौके पर व्यवस्थाओं का जायजा लेते रहे। चित्रकूट में बारिश थमने का नाम नहीं ले रही थी। आसमान से लगातार पानी बरस रहा था और मंदाकिनी नदी का जलस्तर तेजी से बढ़ रहा था। हालात ऐसे बन चुके थे कि नदी का उफान सिर्फ किनारों तक सीमित नहीं था, बल्कि शहर और आसपास के इलाकों के लिए चिंता का कारण बन गया था। इसी दौरान चित्रकूट की लाइफलाइन माने जाने वाला हनुमानधारा पुल भी बाढ़ की चपेट में आ गया और आवागमन पर बड़ा असर पड़ा।

यह वह वक्त था जब जिले के प्रशासनिक अमले के सामने एक साथ कई चुनौतियां खड़ी थीं बाढ़ प्रभावित लोगों तक राहत पहुंचाना, रास्ते खुलवाना, बिजली-पानी जैसी जरूरी व्यवस्थाएं बहाल कराना और आने वाले प्रशासनिक दौरे की तैयारियां करना।
लेकिन इस पूरी कहानी का एक हिस्सा ऐसा भी था, जो कैमरे की नजर से दूर रहा।
रात की डिनर टेबल से ज्यादा जरूरी थी बाढ़ की स्थिति
रात करीब 10 बजे का वक्त। सरकारी बंगले में भोजन तैयार था, लेकिन सतना कलेक्टर सतीश कुमार एस के लिए उस समय डिनर से ज्यादा जरूरी चित्रकूट के हालात थे। वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग के जरिए वे लगातार स्थिति की जानकारी ले रहे थे और अधिकारियों से अपडेट ले रहे थे।
चित्रकूट जाना भी जरूरी था।
बारिश के कारण रास्ते प्रभावित थे। पयस्वनी नदी का जलस्तर भी बढ़ा हुआ था और कई स्थानों पर सड़कें प्रभावित हो चुकी थीं। इसके बावजूद प्रशासनिक टीम ने मौके पर पहुंचकर स्थिति का जायजा लेने और राहत कार्यों को गति देने की तैयारी जारी रखी।
कुछ ही घंटों बाद कलेक्टर खुद चित्रकूट में मौजूद थे।
सामने बाढ़ थी, पीछे पूरी मशीनरी को संभालना था
चित्रकूट पहुंचने के बाद प्राथमिकता साफ थी जहां लोग संकट में हैं, वहां प्रशासन पहुंचे।
बाढ़ प्रभावित इलाकों में जिला पंचायत सीईओ शैलेंद्र सिंह एडीएम विकाश सिंह सहित अन्य अधिकारियों ने लोगों से लगातार संवाद किया गया। राहत और बचाव की व्यवस्थाओं को लेकर जरूरी निर्देश दिए गए। जिन रास्तों पर पानी या मलबे के कारण आवागमन प्रभावित हुआ था, उन्हें बहाल कराने की प्रक्रिया शुरू की गई।
इसी दौरान जिले में मुख्यमंत्री के दौरे की तैयारियां भी चल रही थीं।
एक तरफ बाढ़ प्रभावित लोगों तक मदद पहुंचाने की जिम्मेदारी थी और दूसरी तरफ मुख्यमंत्री के कार्यक्रम की व्यवस्थाओं को भी संभालना था। ऐसे समय में प्रशासन के लिए सबसे बड़ी चुनौती थी कि दोनों मोर्चों पर व्यवस्था प्रभावित न हो।
15 किलोमीटर के प्रभावित क्षेत्र में राहत पहुंचाना आसान नहीं था
चित्रकूट का मध्यप्रदेश वाला प्रभावित क्षेत्र कई किलोमीटर में फैला हुआ था। कुछ स्थानों तक पहुंचना सामान्य परिस्थितियों में भी आसान नहीं था और बाढ़ के बाद हालात और कठिन हो गए थे।
राहत सामग्री पहुंचाने से लेकर प्रभावित परिवारों की स्थिति जानने तक प्रशासनिक टीम लगातार सक्रिय रही।
कई जगह सड़कें साफ कराने का काम शुरू हुआ। आवागमन बहाल करने के प्रयास किए गए। जरूरी सेवाओं को दोबारा पटरी पर लाने के लिए विभागीय अमले को लगाया गया।
यह काम ऐसा था, जिसमें हर घंटे बदलते हालात के हिसाब से फैसले लेने पड़ रहे थे।
मुख्यमंत्री का दौरा खत्म हुआ, लेकिन कलेक्टर का काम नहीं
मुख्यमंत्री के दौरे और कार्यक्रम की जिम्मेदारियां पूरी होने के बाद भी कलेक्टर सतीश कुमार एस की फील्ड गतिविधियां खत्म नहीं हुईं।
बल्कि इसके बाद राहत कार्यों पर ध्यान और बढ़ गया।
बाढ़ के बाद असली चुनौती थी प्रभावित गांवों तक पहुंचना और वहां की वास्तविक स्थिति को समझना। सिर्फ मुख्य सड़क या कस्बे तक सीमित रहकर हालात का आकलन नहीं किया जा सकता था।
इसीलिए प्रशासनिक टीम को उन इलाकों तक पहुंचना पड़ा, जहां रास्ते आसान नहीं थे।
सतना कलेक्टर चौथे दिन भी छाता लेकर गांव की ओर निकल पड़े
बाढ़ को कई दिन गुजर चुके थे, लेकिन कई इलाकों में हालात सामान्य नहीं हुए थे।
चौथे दिन कलेक्टर एक गांव की ओर पैदल जाते नजर आए। हाथ में छाता था और सामने बारिश से प्रभावित रास्ता।

यह दौरा किसी औपचारिक कार्यक्रम का हिस्सा नहीं था।
उद्देश्य था मौके पर जाकर खुद देखना कि ग्रामीणों तक राहत पहुंच रही है या नहीं, रास्तों की स्थिति क्या है और प्रशासन की व्यवस्था जमीन पर कितनी प्रभावी है।
फील्ड में मौजूद अधिकारियों से जानकारी लेने के साथ प्रभावित लोगों से भी बातचीत की गई।
सतना कलेक्टर की बाढ़ के बीच लगातार छह दिन की मेहनत

लगातार बारिश और बाढ़ के बाद धीरे-धीरे हालात सामान्य होने लगे। सड़कों से पानी और मलबा हटाने का काम आगे बढ़ा। आवागमन बहाल होने लगा और जनजीवन पटरी पर लौटने लगा।
लेकिन प्रशासन के लिए राहत कार्य अभी पूरी तरह खत्म नहीं हुआ था।
कलेक्टर प्रभावित परिवारों के बीच पहुंचे। लोगों से बातचीत की और उन्हें भरोसा दिलाया कि प्रशासन उनके साथ है।
उनके लिए यह सिर्फ एक निरीक्षण नहीं था, बल्कि यह सुनिश्चित करने की कोशिश थी कि बाढ़ के बाद पीछे छूट गए परिवारों तक भी सरकारी मदद पहुंचे।
असली कहानी उस वक्त लिखी जा रही थी, जब कैमरा बंद था
आज के दौर में किसी भी प्रशासनिक गतिविधि की तस्वीर और वीडियो तुरंत सोशल मीडिया पर दिखाई देने लगते हैं। लेकिन राहत और पुनर्वास का बड़ा हिस्सा ऐसा भी होता है, जिसकी कोई रिकॉर्डिंग नहीं होती।

कागजों पर निर्देश जारी करना आसान है, लेकिन बाढ़ के बीच प्रभावित गांव तक पहुंचना, रास्ते खुलवाना, अधिकारियों को लगातार सक्रिय रखना और लोगों की जरूरतों के हिसाब से व्यवस्थाएं बदलना एक अलग चुनौती है।

सतना के चित्रकूट की इस बाढ़ के दौरान भी प्रशासन के सामने यही चुनौती थी।
पीली शर्ट इस कहानी में सिर्फ एक पहचान नहीं, बल्कि उन छह दिनों की लगातार फील्ड मौजूदगी का प्रतीक बन गई।
कहीं रात में वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग के जरिए हालात की समीक्षा, कहीं बाढ़ प्रभावित चित्रकूट में पहुंचकर जायजा, कहीं मुख्यमंत्री के दौरे की जिम्मेदारी और उसके बाद फिर राहत कार्यों में जुटना यह सब उस समय हो रहा था जब कैमरा जरूरी नहीं कि साथ चल रहा हो।
यह कहानी किसी कैमरे की रिकॉर्डिंग नहीं, बल्कि उन कामों की पड़ताल है जो कैमरा बंद होने के बाद भी चलते रहे।










