विंध्य में मानसून की बेरुखी से धान की फसल पर मंडराया सूखा संकट, खेतों में दरारें देख किसानों के माथे पर खिंची चिंता की लकीरें: कृषि वैज्ञानिक ने दी ‘क्रॉप डायवर्सिफिकेशन’ अपनाने की समझाइश


सतना/मैहर: जुलाई का महीना आधा बीत जाने के बाद भी विंध्य अंचल में लगातार और पर्याप्त मानसूनी बारिश न होने के कारण अन्नदाताओं की चिंताएं चरम पर पहुंच गई हैं। अंचल में मुख्य रूप से बोई जाने वाली धान (Paddy) की खड़ी फसल अब पानी के गंभीर अभाव में दम तोड़ने लगी है। मैदानी इलाकों से आ रही खबरों के मुताबिक, ग्रामीण क्षेत्रों के खेतों में पर्याप्त नमी न होने से मिट्टी सूखने लगी है और उनमें गहरी दरारें दिखाई देने लगी हैं। सिंचाई के पुख्ता साधन न होने के कारण क्षेत्र के छोटे और सीमांत किसानों की मुश्किलें दिन-ब-दिन गंभीर होती जा रही हैं। यदि आगामी कुछ दिनों में अंचल में जोरदार बारिश नहीं होती है, तो धान के कुल उत्पादन में भारी गिरावट आ सकती है।


पानी के अभाव में थमी धान की बढ़वार; टयूबवेल और कुओं के वैकल्पिक सहारे किसान

ग्रामीण अंचलों से मिल रही जमीनी कड़ियाँ इस प्रकार हैं:

  • सूखने की कगार पर रोपा: किसानों का कहना है कि धान की रोपाई के बाद इस समय फसल को सबसे ज्यादा पानी और नमी की आवश्यकता होती है। मौसम की बेरुखी और चिलचिलाती धूप के कारण पौधों की बढ़वार (Growth) पूरी तरह रुक गई है।
  • बढ़ रहा है आर्थिक बोझ: संपन्न किसान तो निजी नलकूपों (Tubewells) और पंपों के वैकल्पिक सहारे जैसे-तैसे अपनी फसल बचाने की जद्दोजहद में जुटे हैं, जिससे उनकी खेती की लागत लगातार बढ़ रही है। वहीं, साधनहीन गरीब किसान केवल आसमान की ओर टकटकी लगाए मानसूनी कड़ियों के जुड़ने की प्रार्थना कर रहे हैं।

कृषि वैज्ञानिक डॉ. गुफरान उस्मानी की दो टूक सलाह: केवल धान के भरोसे न रहें, अपनाएं फसल विविधीकरण

इस प्राकृतिक संकट के बीच कृषि विज्ञान केंद्र के वरिष्ठ वैज्ञानिक डॉ. गुफरान उस्मानी ने किसानों को इस विलेख से उबरने के लिए महत्वपूर्ण विधिक सलाह दी है:

  1. कम पानी वाली फसलों पर दें ध्यान: डॉ. उस्मानी ने किसानों को सुझाव दिया है कि वे केवल धान की पारंपरिक खेती पर निर्भर रहने के बजाय अपनी रणनीति बदलें। जिन खेतों में पानी की सुचारू व्यवस्था नहीं है, वहां उपलब्ध सीमित नमी का उपयोग कर कम पानी में पकने वाली दालें (Pulses), तिलहन (Oilseeds) और मोटे अनाजों की बुआई पर विचार करें।
  2. नमी संरक्षण के उपाय अपनाएं: उन्होंने कहा कि वर्तमान मौसम की अनिश्चितता और सूखे के जोखिम को कम करने का एकमात्र वैज्ञानिक तरीका ‘फसल विविधीकरण’ (Crop Diversification) ही है। इसके साथ ही खेतों में उपलब्ध जल संसाधनों का अपव्यय रोकने और ‘मल्चिंग’ जैसी नमी संरक्षण तकनीकों का उपयोग करने की समझाइश दी गई है।

सूखे की स्थिति का तार्किक एवं कृषिगत विश्लेषण (Crop & Moisture Matrix)

  • प्रमुख प्रभावित फसल: धान (Paddy – खरीफ की मुख्य फसल)।
  • मुख्य लक्षण (Core Symptoms): खेतों की मिट्टी का कड़ा होना, दरारें पड़ना और पौधों का पीला पड़ना।
  • वैकल्पिक समाधान (Alternative Action Plan): फसल विविधीकरण के तहत कम पानी वाली दलहनी व तिलहनी फसलों का चयन।

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