मैहर : शिक्षा व्यवस्था और प्रशासनिक लेटलतीफी का एक बेहद अनोखा और हैरान कर देने वाला मामला मैहर जिले से सामने आया है। जिले के ताला कस्बा स्थित शासकीय कला एवं विज्ञान कॉलेज में शुक्रवार सुबह उस समय हड़कंप मच गया, जब कॉलेज के भवन मालिक ने पिछले आठ वर्षों से बकाया किराए का भुगतान न होने से नाराज होकर कॉलेज के मुख्य प्रवेश द्वार (मेन गेट) पर अपना ताला ठोक दिया। इस अचानक हुई तालाबंदी के कारण कॉलेज की पूरी शैक्षणिक गतिविधियां ठप हो गईं और सुबह-सुबह क्लास अटेंड करने पहुंचे छात्र-छात्राओं सहित प्राध्यापकों व कर्मचारियों को घंटों गेट के बाहर ही खड़े होकर तमाशा देखना पड़ा।

साल 2018 से निजी भवन की कड़ियों में चल रहा है कॉलेज; महज ₹5,447 है मासिक किराया
ग्राउंड जीरो से प्राप्त जानकारी के अनुसार, इस पूरे विवाद की कड़ियाँ और भवन मालिक के आरोप इस प्रकार हैं:
- 8 वर्षों से एक भी धेला नहीं मिला: पीड़ित भवन मालिक शंकर सिंह ने बताया कि यह शासकीय महाविद्यालय वर्ष 2018 से उनके निजी भवन में संचालित हो रहा है। लोक निर्माण विभाग (PWD) के मूल्यांकन के आधार पर भवन का किराया 5,447 रुपये प्रति माह तय किया गया था, लेकिन विडंबना देखिए कि पिछले करीब आठ सालों से उच्च शिक्षा विभाग या कॉलेज प्रबंधन ने उन्हें एक भी महीने का किराया विधिक रूप से भुगतान नहीं किया है।
- अधिकारियों के चक्कर काटकर हारा: भवन मालिक का आरोप है कि वे पिछले कई वर्षों से अपनी ही संपत्ति का किराया पाने के लिए कॉलेज के प्राचार्यों से लेकर भोपाल में बैठे आला अधिकारियों और स्थानीय जिला प्रशासन के दफ्तरों के चक्कर काटकर थक चुके थे, लेकिन उनकी लिखित व मौखिक गुहार को हर बार ठंडे बस्ते में डाल दिया गया।
प्राचार्य ने दिया 7 दिनों का लिखित विधिक अल्टीमेटम; तब जाकर खुला ताला और बहाल हुई कक्षाएं
कॉलेज के मुख्य द्वार पर तालाबंदी और छात्रों के हंगामे की खबर जैसे ही मैहर प्रशासनिक अमले तक पहुंची, हड़कंप मच गया:
- मौके पर दौड़े अफसर: कॉलेज के प्राचार्य ने आनन-फानन में स्टाफ के साथ मौके पर पहुंचकर बेहद आक्रोशित भवन मालिक शंकर सिंह को समझाने का प्रयास किया और उनके साथ विधिक चर्चा की।
- लिखित आश्वासन पर बनी बात: काफी देर तक चली मान-मनौव्वल के बाद, जब प्राचार्य ने आगामी 7 दिनों के भीतर बजट आवंटन कराकर किराया भुगतान की विधिक प्रक्रिया शुरू कराने का ठोस लिखित आश्वासन दिया, तब कहीं जाकर शंकर सिंह ने गेट का ताला खोला। इसके बाद छात्र कैंपस के भीतर प्रवेश कर सके और कॉलेज का संचालन दोबारा सामान्य हो सका।
निष्कर्ष: सरकारी तंत्र की साख पर उठे गंभीर यक्ष प्रश्न
अंचल के प्रबुद्ध नागरिकों का कहना है कि एक तरफ सरकारें उच्च शिक्षा के बुनियादी ढांचे को मजबूत करने और नए कॉलेजों को खोलने का ढिंढोरा पीटती हैं, वहीं दूसरी तरफ ₹5,447 जैसी मामूली मासिक राशि का भुगतान 8 साल तक न करना प्रशासनिक तंत्र की घोर लापरवाही और उदासीनता को दर्शाता है। यदि समय रहते इस विधिक समस्या का स्थायी निराकरण कर कॉलेज के खुद के सरकारी भवन का निर्माण नहीं कराया गया, तो भविष्य में छात्रों का भविष्य फिर से अधर में लटक सकता है।






