नर्मदा जल विवाद पर मध्यप्रदेश में सियासी भूचाल: कांग्रेस राष्ट्रीय सचिव कुणाल चौधरी का मोहन सरकार पर बड़ा हमला— ‘गुजरात के आगे नतमस्तक हुई सरकार, मिलने थे ₹7,669 करोड़ और दे आए ₹550 करोड़’

भोपाल: मानसून सत्र की आहट के बीच मध्यप्रदेश की सियासत में ‘लाइफलाइन’ मानी जाने वाली मां नर्मदा के जल और वित्तीय अधिकारों को लेकर एक नया विधिक व राजनीतिक घमासान छिड़ गया है। राजधानी भोपाल स्थित प्रदेश कांग्रेस मुख्यालय (PCC) में आयोजित एक तीखी प्रेस वार्ता के दौरान कांग्रेस के राष्ट्रीय सचिव और पूर्व विधायक कुणाल चौधरी ने प्रदेश की डॉ. मोहन यादव सरकार पर अत्यंत गंभीर और सनसनीखेज आरोप लगाए हैं। चौधरी ने सरकार पर मध्यप्रदेश के आर्थिक और विधिक हितों की अनदेखी कर गुजरात सरकार के सामने घुटने टेकने का आरोप लगाते हुए पूरे मामले में श्वेत पत्र जारी कर जवाब देने की विधिक मांग की है।

८० फीसदी प्रवाह मध्यप्रदेश में, फिर भी हितों से विधिक समझौता क्यों?

पीसीसी में मीडिया के समक्ष विलेख और वित्तीय आंकड़े रखते हुए कांग्रेस नेता कुणाल चौधरी ने निम्नलिखित मुख्य कड़ियाँ रेखांकित कीं:

  • मध्यप्रदेश के हक पर डाका: कुणाल चौधरी ने विधिक तर्क देते हुए कहा कि मां नर्मदा का लगभग 80 प्रतिशत प्रवाह क्षेत्र मध्यप्रदेश की भौगोलिक सीमाओं के भीतर आता है। इसके बावजूद राज्य के किसानों, बिजली उपभोक्ताओं और विधिक अधिकारों की कीमत पर पड़ोसी राज्य गुजरात को अनुचित लाभ पहुंचाया जा रहा है।
  • करोड़ों के लेन-देन का बड़ा आरोप: कांग्रेस सचिव ने एक चौंकाने वाला वित्तीय डेटा साझा करते हुए दावा किया कि पूर्व के विधिक विलेखों और समझौतों के तहत गुजरात सरकार से मध्यप्रदेश को ₹7,669 करोड़ रुपये की भारी-भरकम राशि मिलनी थी। लेकिन इसके ठीक विपरीत, मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव गुजरात के आर्थिक हितों के पोषण के लिए ₹550 करोड़ रुपये उल्टे गुजरात सरकार को सौंप कर आ गए हैं।

किन परिस्थितियों में लिया गया यह आत्मघाती विधिक फैसला? कांग्रेस ने मांगा आधिकारिक जवाब

इस मामले को लेकर कांग्रेस ने विधानसभा के आगामी सत्र में सरकार को घेरने और मैदानी स्तर पर बड़ा विधिक आंदोलन खड़ा करने की रूपरेखा तैयार की है:

  1. आर्थिक संप्रभुता से खिलवाड़: कांग्रेस ने इस फैसले को मध्यप्रदेश की साढ़े आठ करोड़ जनता और सरकारी खजाने के विधिक अधिकारों के साथ एक बड़ा विश्वासघात करार दिया है। कुणाल चौधरी ने कहा कि सूबा पहले से ही साढ़े चार लाख करोड़ के कर्ज में डूबा है, ऐसे में प्रदेश का हक छोड़ना विधिक रूप से अक्षम्य है।
  2. शर्तें सार्वजनिक करे सरकार: मुख्य विपक्षी दल ने मांग की है कि मुख्यमंत्री और मुख्य सचिव तत्काल उन विधिक परिस्थितियों और संधियों की कड़ियाँ जनता के सामने स्पष्ट करें, जिनके दबाव में आकर मध्यप्रदेश को इस भारी वित्तीय और जल घाटे का शिकार होना पड़ा है।

सचिवालय और जल संसाधन विभाग के विलेखों पर भी उठ रहे हैं विधिक सवाल

प्रशासनिक मुस्तैदी और आगामी विधायी रणनीति की कड़ियाँ —

“कुणाल चौधरी की इस प्रेस वार्ता के बाद जल संसाधन विभाग और नर्मदा घाटी विकास प्राधिकरण (NVDA) के गलियारों में भी सुगबुगाहट तेज हो गई है. कांग्रेस के विधिक सेल का कहना है कि नर्मदा ट्रिब्यूनल के मूल विलेखों और बिजली-पानी के बंटवारे की कड़ियों को दरकिनार कर यह गुपचुप समझौता किया गया है.

यदि सरकार ने इस वित्तीय विनिमय पर स्थिति स्पष्ट नहीं की, तो कांग्रेस इस मामले को माननीय न्यायालय में विधिक चुनौती देगी। बहरहाल, मानसून के इस मौसम में नर्मदा के पानी और पैसों पर शुरू हुआ यह विधिक विवाद आने वाले दिनों में मप्र की राजनीति का पारा और अधिक बढ़ाने का संकेत दे रहा है।”

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