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नर्मदापुरम ‘मासूम हत्याकांड’ में फांसी की सजा रद्द: HC ने बदला फैसला—अब अंतिम सांस तक जेल में कटेगी आरोपी की जिंदगी; 25 साल तक कोई रियायत नहीं

नर्मदापुरम ‘मासूम हत्याकांड’ में फांसी की सजा रद्द: HC ने बदला फैसला—अब अंतिम सांस तक जेल में कटेगी आरोपी की जिंदगी; 25 साल तक कोई रियायत नहीं

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The Khabrilal

Published On: May 9, 2026, 9:15 PM IST

Updated On: May 9, 2026, 9:15 PM IST

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जबलपुर/नर्मदापुरम | मध्य प्रदेश हाई कोर्ट ने नर्मदापुरम की 6 वर्षीय मासूम बच्ची से दुष्कर्म और हत्या के मामले में एक ऐतिहासिक फैसला सुनाया है। जस्टिस विवेक अग्रवाल और जस्टिस एके सिंह की युगलपीठ ने जिला अदालत द्वारा आरोपी अजय वाडिवा को सुनाई गई फांसी की सजा को ‘अंतिम सांस तक आजीवन कारावास’ में बदल दिया है। कोर्ट ने स्पष्ट किया कि आरोपी को मृत्युपर्यंत जेल की सलाखों के पीछे ही रहना होगा और शुरुआती 25 वर्षों तक उसे किसी भी प्रकार की पैरोल या कानूनी छूट नहीं मिलेगी।

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मुख्य बिंदु

  • सजा में बदलाव: जिला अदालत की फांसी की सजा को रद्द कर ‘अंतिम सांस तक जेल’ (आजीवन कारावास) में बदला गया।
  • सुधार का तर्क: हाई कोर्ट ने सोशल ऑडिट रिपोर्ट का हवाला देते हुए कहा कि सजा तय करते समय केवल अपराध की क्रूरता नहीं, बल्कि आरोपी की सामाजिक पृष्ठभूमि और सुधरने की गुंजाइश भी देखी जानी चाहिए।
  • ‘रेयरेस्ट ऑफ रेयर’ नहीं माना: कोर्ट के अनुसार, तमाम परिस्थितियों और आरोपी की पृष्ठभूमि को देखते हुए यह मामला विरल से विरलतम (Rare of Rarest) की श्रेणी में नहीं आता।
  • 25 साल का नो-पैरोल लॉक: आरोपी को कम से कम 25 साल तक जेल में बिना किसी माफी या रियायत के काटना ही होगा।

क्या था रूह कंपा देने वाला पूरा मामला?

यह सनसनीखेज मामला पिछले साल की शुरुआत का है, जिसने पूरे प्रदेश को आक्रोशित कर दिया था।

  1. लापता हुई थी मासूम: 2 जनवरी 2025 को नर्मदापुरम जिले के सिवनी मालवा थाना क्षेत्र से 6 साल की मासूम अचानक गायब हो गई थी।
  2. दरिंदगी और कत्ल: पुलिस ने संदेह के आधार पर अजय वाडिवा को हिरासत में लिया। पूछताछ में उसने कबूल किया कि वह बच्ची को नहर किनारे झाड़ियों में ले गया, जहाँ उसके साथ दुष्कर्म किया। बच्ची के शोर मचाने पर उसने गला घोंटकर उसकी हत्या कर दी।
  3. फांसी का फैसला: नर्मदापुरम जिला सत्र न्यायालय ने मामले की गंभीरता को देखते हुए 9 अप्रैल 2025 को आरोपी को दोषी करार देते हुए फांसी की सजा सुनाई थी।

बचाव पक्ष के तर्क: डीएनए रिपोर्ट पर उठाए थे सवाल

फांसी की सजा के खिलाफ आरोपी अजय वाडिवा ने हाई कोर्ट का दरवाजा खटखटाया था। बचाव पक्ष के वकीलों ने अपील में दलील दी थी कि:

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  • मासूम बच्ची को आखिरी बार आरोपी के साथ देखने वाला कोई चश्मदीद गवाह नहीं है।
  • मामले में पेश की गई डीएनए (DNA) रिपोर्ट पूरी तरह विश्वसनीय नहीं है।

हालांकि, हाई कोर्ट ने इन दलीलों को आंशिक रूप से सुनते हुए दोषसिद्धि को तो बरकरार रखा, लेकिन फांसी की सजा को आजीवन कारावास में तब्दील कर दिया।


हाई कोर्ट का फैसला और सामाजिक दृष्टिकोण

युगलपीठ ने अपने विस्तृत आदेश में कहा कि अपराधी को सुधरने का एक मौका मिलना चाहिए। सजा का मकसद केवल बदला लेना नहीं बल्कि न्याय की तराजू पर संतुलन बनाना है। यही वजह है कि फांसी को टालकर ‘अंतिम सांस तक जेल’ की सजा तय की गई, जो समाज की सुरक्षा और न्याय दोनों को सुनिश्चित करती है।


खबर का सारांश

  • अपराधी: अजय वाडिवा।
  • पीड़िता: 6 वर्षीय अबोध बालिका।
  • निचली अदालत का फैसला: 9 अप्रैल 2025 को फांसी की सजा।
  • हाई कोर्ट का नया आदेश: फांसी रद्द, 25 साल की बिना रियायत वाली सख्त उम्रकैद (अंतिम सांस तक)।

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