रामनगर गोलीकांड को 23 वर्ष पूरे: न्याय की प्रतीक्षा में पीड़ित परिवार

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MP RAMNAGAR FIRING : मध्य प्रदेश के मैहर जिले के रामनगर में 2 सितंबर 2002 को हुए बहुचर्चित गोलीकांड को आज ठीक 23 वर्ष हो गए। इस घटना ने पूरे क्षेत्र को हिला दिया था, जिसमें तीन निर्दोष ग्रामीणों की जान चली गई थी। इतने लंबे समय के बाद भी मामला अदालतों की कठिन प्रक्रिया में उलझा हुआ है, और पीड़ित परिवारों को पूर्ण न्याय की प्रतीक्षा करनी पड़ रही है।

क्या थी घटना

यह घटना एक साधारण पोस्टमार्टम विवाद से शुरू हुई थी। 30 अगस्त 2002 को रामनगर के निवासी महेश कोल ने कथित रूप से फांसी लगाकर आत्महत्या कर ली थी। उनके शव का पोस्टमार्टम तत्कालीन डॉक्टर अभिमन्यु सिंह द्वारा समय पर नहीं किया गया, जिससे स्थानीय लोगों में भारी आक्रोश फैल गया। 2 सितंबर तक पोस्टमार्टम न होने पर गुस्साए ग्रामीणों ने थाने का घेराव कर दिया। प्रदर्शनकारियो ने थाने के समक्ष एकत्र होकर दोषी डॉक्टर के विरुद्ध कार्यवाही एवं शव का पोस्टमार्टम की मांग करनी शुरू कर दी धीरे-धीरे भीड़ ज्यादा हो गई और कथित रूप से उक्त भीड़ को नियंत्रित करने के प्रयास में पुलिस द्वारा गोली चलाई गई जिसमें तीन ग्रामीणों की मौत हो गई थीजिसमें पुरुषोत्तम शर्मा (राम शिरोमणि शर्मा), शैलेंद्र गुप्ता (सतेंद्र गुप्ता) और मनी चौधरी की मौत हो गई। इसके अलावा 12 अन्य लोग घायल हुए थे।

एसपी भी हुए थे घायल

आनन फानन में तत्कालीन प्रशासन ने भीड़ नियंत्रण में अपनी असफलता को ढकने के प्रयास में 56 लोगों के विरुद्ध एफआईआर दर्ज की और एफआईआर में बताया कि मौके पर उपस्थित तत्कालीन एसपी राजाबाबू सिंह और कलेक्टर एसएन मिश्रा को भी चोटें आईं। ग्रामीणों का कहना था कि पोस्टमार्टम में देरी से महेश कोल के परिवार को न्याय नहीं मिल पा रहा था, जो उनकी मांग का केंद्र था।

56 लोगों के खिलाफ दर्ज हुआ था केस

इस घटना के बाद पुलिस ने आंदोलनकारियों के खिलाफ छह अलग-अलग एफआईआर दर्ज कीं, जिसमें भाजपा नेता अरुण द्विवेदी, शिवा मिश्रा, हसीनुद्दीन सिद्दिकी पुन्न्नू, सतेंद्र शर्मा सहित कुल 56 लोगों को आरोपी बनाया गया। आरोपियों पर आईपीसी की धाराओं 147, 148, 149, 294, 323, 307, 333, 353 के तहत मामला दर्ज किया गया, जिसमें बलवा, उपद्रव, पुलिस पर हमला और हत्या के प्रयास जैसे संगीन आरोप शामिल थे। अरुण द्विवेदी एवं पुन्नू मुसलमान पर विशेष रूप से लोगों को भड़काने का आरोप लगाया गया।
मामले की सुनवाई लंबे समय तक चली। और विचारण के दौरान 7 आरोपी म्रत्यु को प्राप्त होकर प्रकरण से बरी हो गय 20 वर्ष बाद 2 नवंबर 2022 को द्वितीय अपर जिला एवं सत्र न्यायाधीश अजीत कुमार तिर्की की अदालत ने फैसला सुनाया। इसमें चार महिलाओं सहित 49 आरोपियों को दोषी ठहराया गया जिसमे एक आरोपी को छोड़ 48 लोगो को जेल जाना पड़ा और सभी को सात-सात वर्ष की सश्रम कारावास की सजा सुनाई गई। सात आरोपी पहले ही मर चुके थे, जबकि 1 आरोपी फैसले के समय अपना कैंसर का इलाज करा रहा था जो बाद में जेल भेजा गया । हालांकि यह फैसला अपूर्ण था क्योंकि यह मुख्य रूप से आंदोलनकारियों पर केंद्रित था। पीड़ित परिवारों का कहना है कि पुलिस की गोलीबारी और उसके बाद की कार्रवाई पर अभी भी पूर्ण और पारदर्शी जाँच नहीं हुई है। मामला हाईकोर्ट में अपील के चरण में है, और पीड़ित पक्ष जो की आरोपी है न्याय की आस में निर्णय या मृत्यु का इंतज़ार कर रहे है हलाकि बातचीत में आरोपी गण यह उम्मीद करते है की उच्च न्यायलय से उन्हें न्याय प्राप्त होगा ।

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