मझौली (सीधी)। एक तरफ सरकार ‘हर गांव पक्की सड़क’ का ढिंढोरा पीट रही है, वहीं दूसरी तरफ ग्राम पंचायत जमुआ नं. 01 में महज 15 से 20 फीट जमीन के टुकड़े के लिए ग्रामीणों की सांसे अटकी हुई हैं। 80 साल पुराने ऐतिहासिक सार्वजनिक रास्ते पर ऐसा अड़ंगा लगा है कि 700 मीटर की बनी-बनाई चमचमाती सड़क धूल फांक रही है और गांव वाले नारकीय जीवन जीने को मजबूर हैं।

प्रशासन का अमला, बुलडोजर और हाई-वोल्टेज ड्रामा!
मामला तब और गर्मा गया जब तहसीलदार, पटवारी और भारी पुलिस बल की मौजूदगी में जेबीसी (JCB) गर्जना करते हुए मौके पर पहुंची। लेकिन भू-स्वामी रामनिहोर विश्वकर्मा और उनके परिजनों ने कानून और प्रशासन को ठेंगे पर रख दिया।
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प्रशासन से हाथापाई की नौबत: जैसे ही बुलडोजर आगे बढ़ा, घर के लोग महिलाओं और परिजनों को आगे कर पुलिस-प्रशासन से भिड़ गए।
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सरपंच का प्रस्ताव भी खारिज: गांव की सरपंच श्रीमती सुनैना पनिका ने मौके पर पहुंचकर काफी समझाइश दी और ‘ज़मीन के बदले दूसरी ज़मीन’ देने का सरकारी ऑफर भी रखा, लेकिन दबंगई के आगे सब बेअसर रहा। हंगामे के चलते अधिकारियों को खाली हाथ उल्टे पांव लौटना पड़ा।

कांटेदार तार, फिसलन और खाट पर जिंदगी!
यह सिर्फ ज़मीन का विवाद नहीं, बल्कि इंसानी जिंदगियों का सौदा बन चुका है। 15 जनवरी 2026 की वह भयानक तस्वीर आज भी ग्रामीणों के दिलों में तैर रही है, जब एक बुजुर्ग महिला की गंभीर हालत होने पर उन्हें एम्बुलेंस न मिलने के कारण खाट (चारपाई) पर लादकर ले जाना पड़ा था।
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रास्ते में बिछाए कांटे: आम जनता को रोकने के लिए रास्ते पर कटीली झाड़ियां और कांटेदार तार ठोक दिए गए हैं।
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फिसलन से बना ‘डेथ ट्रैप’: बारिश के पानी से कच्चा रास्ता इतना चिकना और कीचड़युक्त हो चुका है कि दो पहिया वाहन भी फिसलकर गिर रहे हैं।
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बड़ा सवाल: ग्रामीणों का गुस्सा चरम पर है—“अगर इस जानलेवा रास्ते और कांटों के कारण किसी मरीज की मौत हो गई या बड़ा हादसा हो गया, तो क्या तहसीलदार और पुलिस इसकी जिम्मेदारी लेंगे?”

कानूनी शिकंजा: BNSS 152 और जबरन भू-अर्जन की अंतिम चेतावनी
मामले की गंभीरता को देखते हुए एसडीएम (SDM) मझौली के निर्देश पर प्रशासन ने अंतिम चाल चल दी है:
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15 दिन का अल्टीमेटम: भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता (BNSS) 2023 की धारा 152 के तहत रामकरण कुशवाहा और रामनिहोर विश्वकर्मा को नोटिस थमाकर 15 दिन में रास्ता खाली करने को कहा गया है।
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कोर्ट में पेशी: आरोपियों को अदालत में हाजिर होकर जवाब देना होगा कि क्यों न इस रास्ते को स्थायी सार्वजनिक संपत्ति घोषित कर दिया जाए।
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अनिवार्य भू-अर्जन (Land Acquisition): राजस्व विभाग की टीम को एक सप्ताह में स्थल पंचनामा और ट्रेस नक्शा तैयार करने का आदेश दिया गया है। अगर आपसी सहमति से कब्जा नहीं हटा, तो सरकार ज़मीन का अधिग्रहण कर सीधे बुलडोजर चलाएगी।

फिलहाल मामला कोर्ट की तारीखों और प्रशासनिक फाइलों में उलझा है, लेकिन सवाल वही है—क्या 15 फीट के हठ के आगे पूरा गांव बंधक बना रहेगा?










