भोपाल: मध्य प्रदेश की राजधानी भोपाल में सामान्य, पिछड़ा एवं अल्पसंख्यक वर्ग अधिकारी कर्मचारी संस्था (SPEAK – स्पीक) ने रविवार को शौर्य स्मारक के समीप एक अत्यंत महत्वपूर्ण और विधिक रूप से रणनीतिक बैठक का आयोजन किया. इस बैठक में संगठन के प्रांतीय पदाधिकारियों और कर्मचारियों ने मध्य प्रदेश सरकार द्वारा प्रस्तावित आगामी लोकसेवा पदोन्नति नियम-2025 के विधिक मसौदे पर अत्यंत तीखी और विधिक आपत्ति दर्ज कराई है. संगठन का दोटूक आरोप है कि यदि सरकार ने इन नए नियमों को हुबहू लागू किया, तो इससे सामान्य, पिछड़ा और अल्पसंख्यक वर्ग के कर्मचारियों के प्रशासनिक व सेवा हित विधिक रूप से बुरी तरह प्रभावित होंगे.

“साल 2016 से लंबित है विवाद, जल्दबाजी में विधिक कदम उठा रही सरकार”
बैठक के बाद ‘स्पीक’ संस्था के प्रांतीय अध्यक्ष के.एस तोमर ने सरकार की इस नई नियमावली के विधिक विरोधाभासों को मीडिया के सामने रखा:
- सेवानिवृत्त कर्मचारियों की अनदेखी: तोमर ने कहा कि मध्य प्रदेश में साल 2016 से ही अधिकारियों-कर्मचारियों की विधिक पदोन्नति प्रक्रिया पूरी तरह प्रभावित और बाधित है. यदि सरकार नए नियम केवल वर्ष 2025 से प्रभावी करती है, तो 2016 से 2025 के बीच प्रभावित हुए कर्मचारियों और इस दौरान बिना पदोन्नति के सेवानिवृत्त (Retired) हो चुके अधिकारियों के विधिक हितों की घोर अनदेखी होगी.
- सरकार खुद असमंजस में: संगठन ने प्रशासनिक सवाल उठाते हुए कहा कि सरकार खुद विधिक रूप से यह तय नहीं कर पा रही है कि वर्ष 2002 के नियम सही हैं या 2025 के. माननीय न्यायालय का अंतिम फैसला आने से पहले ही इतनी जल्दबाजी में विधिक प्रक्रिया शुरू करने का क्या औचित्य है?
इन 5 प्रावधानों से सामान्य और ओबीसी (OBC) वर्ग को भारी नुकसान का दावा
‘स्पीक’ संगठन ने नए विधिक ड्राफ्ट की समीक्षा करते हुए दावा किया कि इसमें शामिल कुछ बिंदु विधिक न्याय के सिद्धांतों के विपरीत हैं:
- वरिष्ठता निर्धारण: नए नियमों में वरिष्ठता (Seniority) तय करने के जो विधिक मापदंड रखे गए हैं, वे विसंगतियों से भरे हैं.
- कॉमन विचारण सूची व अनारक्षित रिक्तियां: आरक्षित वर्ग के अधिकारियों को अनारक्षित (General) वर्ग की विधिक रिक्तियों में विचारण क्षेत्र देने से सामान्य वर्ग के अवसर कम होंगे.
- प्रतीक्षा सूची और बैकलॉग: वेटिंग लिस्ट की वर्तमान व्यवस्था और बैकलॉग पदों को भविष्य के लिए विधिक रूप से सुरक्षित रखने के प्रावधानों से भी इस वर्ग को नुकसान उठाना पड़ेगा.
सुप्रीम कोर्ट के फैसलों की भावना के खिलाफ; मांगें न मानने पर न्यायालय की शरण लेगा संगठन
विधिक समीक्षा की मांग और आगामी रणनीति —
“संस्था के अध्यक्ष के.एस तोमर और उपस्थित विधिक जानकारों ने स्पष्ट किया कि माननीय सर्वोच्च न्यायालय (Supreme Court) के विभिन्न ऐतिहासिक निर्णयों में पदोन्नति में आरक्षण से जुड़े जिन विधिक सिद्धांतों का स्पष्ट उल्लेख किया गया है, यह नया प्रस्तावित नियम उन निर्णयों की मूल भावना के अनुरूप नहीं है. संगठन ने सरकार से पुरजोर विधिक मांग की है कि न्यायालय के निर्देशों के परिप्रेक्ष्य में इन नियमों की पुन: समीक्षा की जाए. यदि सरकार ने इस नियमावली में विधिक व जरूरी बदलाव नहीं किए, तो संगठन बिना किसी देरी के माननीय उच्च न्यायालय या सर्वोच्च न्यायालय का रुख करेगा और वहां अपना विधिक पक्ष मजबूती से रखेगा. आज की बैठक में अंचल के कई विभागों के अधिकारी-कर्मचारी विधिक रूप से अपनी भावी रणनीति तय करने के लिए मुस्तैद रहे.”







