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5G के दौर में आदिम युग मैहर के मनौरा गांव में ‘बहुओं का नेटवर्क जाम’; मायके बात करने के लिए घूंघट निकाल 2 किमी दूर टीले पर जाने की मजबूरी

5G के दौर में आदिम युग मैहर के मनौरा गांव में ‘बहुओं का नेटवर्क जाम’; मायके बात करने के लिए घूंघट निकाल 2 किमी दूर टीले पर जाने की मजबूरी

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The Khabrilal

Published On: Jun 21, 2026, 6:29 PM IST

Updated On: Jun 21, 2026, 6:29 PM IST

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मैहर: आज के आधुनिक और सुपरफास्ट 5G इंटरनेट के युग में जहां देश ‘डिजिटल इंडिया’ बनने का दम भर रहा है, वहीं मैहर जिला मुख्यालय से महज 30 किलोमीटर दूर स्थित भमरहा ग्राम पंचायत का मनौरा गांव आज भी मोबाइल नेटवर्क की एक-एक डंडी (खूंटे) के लिए तरस रहा है। विकास की बयार में इस गांव तक चमचमाती पक्की सड़क, पानी की टंकी और मुक्तिधाम जैसी बुनियादी सुविधाएं तो पहुंच गई हैं और लगभग हर हाथ में मोबाइल फोन भी सज गए हैं, लेकिन कनेक्टिविटी के मामले में यह गांव आज भी पूरी तरह ‘ब्लैक आउट’ है। घरों के भीतर मोबाइल सिर्फ एक बेजान डिब्बा बनकर रह जाते हैं, जिसके कारण यहाँ का सामाजिक ताना-बाना और आपातकालीन व्यवस्थाएं बुरी तरह प्रभावित हो रही हैं।

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150 मकान और 400 वोटर, पर कनेक्टिविटी शून्य

मनौरा गांव की भौगोलिक और सामाजिक स्थिति को बयां करती मुख्य कड़ियां इस प्रकार हैं:

  • घरों में सिग्नल गायब: गांव में करीब 150 पक्के-कच्चे मकान हैं और करीब 400 मतदाता रहते हैं। विडंबना यह है कि यदि किसी ग्रामीण को अपने सगे-संबंधियों को एक फोन भी मिलाना हो, तो उसे अपने घर की चौखट छोड़कर मीलों दूर भागना पड़ता है।
  • 35 साल से जस की तस समस्या: गांव के 35 वर्षीय मुरारी यादव बताते हैं कि उन्होंने जब से होश संभाला है, गांव की यही बेबसी देखी है। जरूरी कॉल के लिए गांव से 2 किलोमीटर दूर खेतों की ऊंची मेढ़ या तालाब के टीले पर जाना पड़ता है, और वहां हवा में हाथ हिलाकर जैसे-तैसे सिग्नल ढूंढना पड़ता है।

पढ़ी-लिखी नई बहुओं के लिए सामाजिक दर्द बनी ‘कनेक्टिविटी’

नेटवर्क का यह गंभीर संकट अब गांव के सामाजिक जीवन में एक नई और अजीबोगरीब चुनौती बनकर उभरा है:

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  1. शर्मिंदगी भरा है घूंघट में मेढ़ पर चढ़ना: मुरारी यादव ने तंज भरे लहजे में बताया कि अब गांव में पढ़ी-लिखी लड़कियां शादी करके बहुएं बनकर आ रही हैं। अब वे अपने पतियों या मायके वालों से सुख-दुख साझा करने के लिए घूंघट निकालकर 2 किलोमीटर दूर खेतों की मेढ़ पर जाकर थोड़ी ही खड़ी रहेंगी? यह बेहद असहज और शर्मिंदगी भरा है।
  2. बारिश और कीचड़ में जान का जोखिम: ग्रामीण पहलवान सिंह के मुताबिक, बारिश के चार महीनों में हालात बदतर हो जाते हैं। रात के अंधेरे में कीचड़ और सांप-बिच्छू के डर के बीच फोन लगाने के लिए खेतों के टीलों तक जाना किसी खतरे से खाली नहीं होता।

बीमारों को एम्बुलेंस बुलाने के लिए पहले लगानी पड़ती है 2 किमी की दौड़

स्वास्थ्य और शिक्षा पर सीधी मार —

“खेतों की मेढ़ पर सिग्नल तलाश रहे ग्रामीण राहुल दाहिया ने बताया कि नेटवर्क न होना यहाँ के लोगों के लिए जानलेवा साबित हो रहा है। आपातकालीन स्थिति में अगर रात को किसी बुजुर्ग की तबीयत बिगड़ जाए या किसी गर्भवती महिला को प्रसव के लिए अस्पताल ले जाना हो, तो सबसे पहले किसी युवक को दौड़कर 2 किलोमीटर दूर तालाब की मेढ़ पर भेजा जाता है। वहां से जब 108 एम्बुलेंस को फोन लगता है, तब जाकर गांव में गाड़ी पहुंच पाती है। कई बार इस देरी के कारण मरीजों की हालत बेहद नाजुक हो जाती है।”

डिजिटल पढ़ाई, ऑनलाइन बैंकिंग और सरकारी योजनाओं के इस दौर में मनौरा गांव के बच्चों की पढ़ाई और युवाओं का रोजगार इस नेटवर्क विहीन व्यवस्था के कारण लगातार पिछड़ रहा है। ग्रामीणों ने मैहर जिला प्रशासन समेत निजी व सरकारी टेलीकॉम कंपनियों (BSNL, Jio, Airtel) से पुरजोर मांग की है कि गांव की सुध ली जाए और यहाँ जल्द से जल्द मोबाइल टावर स्थापित कर इस ‘नेटवर्क जाम’ से मुक्ति दिलाई जाए।

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