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सतना के सरकारी स्कूल का दुनिया में डंका: नेपाल में गूंजा ‘व्यंकट-1’ के बच्चों का ‘सेव अ स्पैरो’ प्रोजेक्ट; 42 देशों के वैज्ञानिकों ने कहा— हम भी अपनाएंगे यह मॉडल

सतना के सरकारी स्कूल का दुनिया में डंका: नेपाल में गूंजा ‘व्यंकट-1’ के बच्चों का ‘सेव अ स्पैरो’ प्रोजेक्ट; 42 देशों के वैज्ञानिकों ने कहा— हम भी अपनाएंगे यह मॉडल

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The Khabrilal

Published On: Jun 6, 2026, 2:22 PM IST

Updated On: Jun 6, 2026, 2:22 PM IST

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सतना, मध्य प्रदेश: विंध्य अंचल के सतना जिले की एक साधारण सरकारी स्कूल की कक्षा से शुरू हुई नन्हीं गौरैया को बचाने की अनूठी मुहिम आज अंतरराष्ट्रीय मंच पर भारत का गौरव बन चुकी है। नेपाल की राजधानी काठमांडू में आयोजित एशिया के सबसे प्रतिष्ठित पर्यावरण सम्मेलनों में से एक ‘कंजर्वेशन एशिया कांग्रेस-2026’ में सतना के व्यंकट क्रमांक 1 उत्कृष्ट विद्यालय के विद्यार्थियों के नवाचार (Innovation) ने दुनिया भर के वैज्ञानिकों और पर्यावरण विशेषज्ञों को चकित कर दिया है। 42 देशों के दिग्गजों के बीच सतना के बच्चों का ‘सेव अ स्पैरो’ (Save a Sparrow) प्रोजेक्ट वैश्विक आकर्षण का मुख्य केंद्र बना रहा।

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काठमांडू में 42 देशों के 500+ वैज्ञानिकों के बीच चमका सतना

3 से 5 जून 2026 तक काठमांडू में “हार्मोनाइजिंग बायोडायवर्सिटी एंड ह्यूमन वेल-बीइंग इन एशिया” विषय पर केंद्रित एक हाई-प्रोफाइल अंतरराष्ट्रीय सम्मेलन का आयोजन किया गया:

  • भारत का एकमात्र चेहरा: इस ग्लोबल समिट में मध्य प्रदेश की शासकीय शिक्षिका डॉ. अर्चना शुक्ला ने भारत का प्रतिनिधित्व किया। वे पूरे देश से इस सम्मेलन में भाग लेने वाली एकमात्र सरकारी स्कूल की शिक्षिका रहीं, जिनके दो शोध-सार (Research Abstracts) का चयन मौखिक और पोस्टर प्रेजेंटेशन दोनों के लिए हुआ।
  • दुनिया ने माना लोहा: जब डॉ. अर्चना ने सतना के बच्चों द्वारा तैयार की गई पर्यावरण परियोजनाओं को वैश्विक मंच पर रखा, तो इंडोनेशिया, मलेशिया, चीन, नेपाल और अबू धाबी सहित कई देशों के प्रतिनिधियों ने इसे अपने देशों में भी लागू करने की आधिकारिक इच्छा जताई।

देश का पहला ‘हाईटेक स्पैरो नेस्ट बॉक्स’ बना आकर्षण का केंद्र

सम्मेलन में सबसे ज्यादा सुर्खियां और वाहवाही सतना के बच्चों द्वारा वर्ष 2021 से लगातार चलाए जा रहे ‘सेव अ स्पैरो प्रोजेक्ट’ को मिली:

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  • चार साल की कड़ी मेहनत: सरकारी स्कूल के इन विद्यार्थियों ने गौरैया के संरक्षण और उनकी घटती आबादी को रोकने के लिए लगातार 4 वर्षों तक जमीनी रिसर्च की।
  • वैज्ञानिकों ने सराहा: बच्चों ने गौरैया की आदतों और सुरक्षा को ध्यान में रखकर एक विशेष ‘स्पैरो नेस्ट बॉक्स’ (Sparrow Nest Box) विकसित किया है। इसे भारत का पहला ऐसा नेस्ट बॉक्स माना जा रहा है जो पूरी तरह गौरैया के संरक्षण की व्यावहारिक आवश्यकताओं के अनुकूल है। पोस्टर प्रेजेंटेशन के दौरान दुनिया भर के टॉप साइंटिस्ट्स ने इसकी मुक्त कंठ से प्रशंसा की।

जब व्यंकट स्कूल की कक्षा बनी ‘प्रकृति की प्रयोगशाला’

डॉ. अर्चना शुक्ला ने अपने शोधपत्र “फ्रॉम क्लासरूम टू कम्युनिटी: प्रोजेक्ट-बेस्ड लर्निंग एज ए कैटेलिस्ट फॉर स्टूडेंट-लेड कंजर्वेशन” के जरिए दुनिया को बताया कि कैसे सतना के बच्चे सिर्फ किताबें पढ़कर रट्टा नहीं मार रहे, बल्कि प्रकृति के असली प्रहरी बन चुके हैं। सम्मेलन में सतना के बच्चों के कई अन्य प्रोजेक्ट्स भी छाए रहे:

  • QR कोडिंग ऑफ ट्रीज: स्कूल और आसपास के पेड़ों पर क्यूआर कोड लगाना ताकि स्कैन करते ही पेड़ की पूरी जानकारी मिल सके।
  • प्लांट इमोशन प्रोजेक्ट: पौधों की भावनाओं और पर्यावरण के प्रति उनकी संवेदनशीलता पर अनोखी केस स्टडी।
  • सेव अ सीड – सेव अ ट्री: बीजों को सहेजने और उनसे नए पौधे तैयार करने का जन-अभियान।
  • जैव विविधता दस्तावेजीकरण: स्थानीय स्तर पर पक्षियों और तितलियों की प्रजातियों की पहचान कर उनका डिजिटल रिकॉर्ड तैयार करना।

सतना के लिए गौरव का क्षण: समाज और विज्ञान का अद्भुत संगम

इस ऐतिहासिक वैश्विक सफलता पर डॉ. अर्चना शुक्ला ने मध्य प्रदेश स्कूल शिक्षा विभाग, मध्य प्रदेश टाइगर फाउंडेशन सोसायटी और एससीबी (SCB) एशिया के अध्यक्ष डॉ. कौस्तुभ शर्मा सहित अपने सभी होनहार विद्यार्थियों और सहयोगी शिक्षकों का आभार व्यक्त किया है। सतना की मिट्टी से उठी यह गूंज साबित करती है कि अगर सरकारी स्कूलों के बच्चों को सही मार्गदर्शन और अवसर मिले, तो वे न सिर्फ बोर्ड परीक्षाओं में टॉप कर सकते हैं, बल्कि पर्यावरण संरक्षण जैसे वैश्विक संकटों का समाधान भी दे सकते हैं।

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