विद्यार्थी जीवन में ही मां-बाप सिखायें अपने बच्चों को संकट को ताकत बनाना

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विद्यार्थी-जीवन साधना का होता है और साधक स्वयं के लिए कभी सुख की कामना नहीं करता। कहा भी गया है कि जो विद्यार्थी सुख की चाह करता है वह विद्या अर्जित नहीं कर सकता।

 

जेएनएन, नई दिल्ली।  विद्यार्थी-जीवन साधना का होता है और साधक स्वयं के लिए कभी सुख की कामना नहीं करता। कहा भी गया है कि जो विद्यार्थी सुख की चाह करता है, वह विद्या अर्जित नहीं कर सकता। यही कारण है कि पहले जब गुरुकुल-आश्रम में बालकों-किशोरों को विद्याध्ययन करने के लिए भेजा जाता था।

तब उन्हें गुरु यज्ञ, भोजन की व्यवस्था करने के लिए समीप के वन से लकड़ियां लाने और आस-पास की बस्तियों में भिक्षा मांगने के लिए भेजा करते थे। इससे शिष्यों के मन-मस्तिष्क में विनम्रता-सहनशीलता-धैर्य का संस्कार भरा जाता था और उसे दु:ख-कष्ट सहन करने के लिए समर्थ और स्वावलंबी बनाया जाता था।

आज वैसी स्थिति नहीं है। आज तो विद्यार्थियों को भौतिकता के पंक (कीचड़) में गिरने के लिए अवसर दिया जाता है, जिसके लिए सर्वाधिक दोषी उनके मां-बाप हैं, जो अपनी संतानों की हर इच्छा पूरी कर उन्हें मनबढ़ बनाते जा रहे हैं। यही कारण है कि वैसे विद्यार्थी संकट में घबराते हैं और अपने ‘विवेक’ का कपाट बंद कर लेते हैं।

इससे उनका कष्ट कम नहीं होता, बल्कि और बढ़ता ही जाता है। दु:ख की अवस्था में ही विद्यार्थी की क्षमता की पहचान होती है। दूसरी ओर, संकट की घड़ी में मित्र-स्वजन की पहचान और परख होती है। धैर्य की कसौटी पर उसका बहुविध परीक्षण किया जाता है।

विद्यार्थियों को अब यह सोचना होगा कि मेरे जीवन-कार्य की सर्वाधिक पूंजी यदि ‘पाप’ हो तो मैं उससे उत्पन्न ‘दु:ख’ को ही सबसे पहले स्वीकार करना चाहूंगा, क्योंकि दु:ख की अनेक कोटि हैं और प्रत्येक का भोग व्यक्तित्व को ठोस आधार प्रदान करता है।

अच्छा-बुरा जीवन-चक्र का हिस्सा है और एक-दूसरे पर आधारित भी, जैसे-तम के बाद पुंज, इसीलिए वे एक-दूसरे के पूरक कहलाते हैं। इससे कोई बच नहीं सका है। वैसे ही विद्यार्थी जब दुखाग्नि में तपकर सामान्यावस्था की प्राप्ति करता है तब उसके व्यक्तित्व की समृद्धि और चुंबकीय गुण सभी को आकर्षित और सम्मोहित करते हैं।

आज जब हम समाचारपत्रों में पढ़ते हैं कि मजदूरी कर रहे किसी व्यक्ति की संतान ने आइएएस की परीक्षा में वरीयताक्रम में प्रभावकारी स्थान अर्जित किया है तब हम सोच में पड़ जाते हैं कि अभावग्रस्त स्थिति में रहकर पढ़ाई करनेवाला विद्यार्थी देश की सबसे बड़ी प्रशासनिक सेवा परीक्षा में बहुतों को पीछे छोड़ते हुए कैसे आगे हो गया।

सच तो यह है कि उसने अपने गरीब और अभावपूर्ण जीवन जीनेवाले मां-बाप को सर्वाधिक समीप से देखा है। इसलिए अपने माता-पिता की प्रतिष्ठा दिलाने के लिए दु:ख और कष्ट को गले लगाते हुए प्रतिष्ठापरक सेवा-परीक्षा में अपनी योग्यता रेखांकित की है। क्या आप भी ऐसा करेंगे?

विचारणीय हैं सु़झाए गये ये मुख्य बातें

  • दुख में ही सुख का भाव छुपा रहता है।
  • विद्यार्थी-जीवन में सुख का कहीं-कोई स्थान नहीं।
  • विद्यार्थियों को अपने मां-बाप के धन का दुरुपयोग नहीं करना चाहिए।
  • मां-बाप को चाहिए कि वे अपनी संतान को जमीनी वास्तविकता का अनुभव कराते रहें।